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वर्ष: 1, अंक16, जुलाई(प्रथम), 2017



आधा पति

कैस जौनपुरी


   सभी सोचते हैं, क्या है ये प्यार? कैसा दिखता है ये प्यार? क्या ये वही है, जो एक नज़र में हो जाता है? क्या ये वही है, जो कभी भुलाये नहीं भूलता? या फिर वो, जो कहता है, “कोई बात नहीं, तुम जैसे भी हो, मुझे पसन्द हो. मुझे तुम्हारे अतीत से कोई लेना-देना नहीं है.”

  फिर ऐसा क्यों होता है कि इतना भरोसा करने के बावजूद हमारा प्यार हमें धोखा देने लगता है? फिर ऐसा क्या था, जो मेरा पति मुझसे प्यार नहीं करता था? मैंने तो उसे अपना सबकुछ मान लिया था.

  मेरे लिए तो “पति माने भगवान” था. फिर मेरा भगवान किसी और के चक्कर में कैसे पड़ गया? और फिर, पड़ा तो पड़ा, मगर उस लड़की को कैसे भूल गया? जो सिर्फ़ उसके सहारे थी. जो अभी भी सिर्फ़ उसी का इन्तिज़ार कर रही थी कि, “कब मेरा भगवान आएगा और मुझे अपने चरणों के दर्शन देगा?”

  मगर मेरा भगवान बहुत निष्‍ठुर निकला. वो तो मुझसे मिलने भी नहीं आया. मैं एक लड़की, अपने माँ-बाप के यहाँ रहने लगी. मगर ये लड़की उसे नहीं भूली थी. उस दिन मेरे पति का जनम-दिन था. मैं अपने मायके में थी. अपने पति के जनम-दिन पर भी मैं अपने मायके में थी. ये बात मुझे कचोट रही थी.

  मगर मैं बेचारी क्या करती? चाहती तो थी कि जाऊँ, और जाकर अपने पति के सामने मिट्टी की दीवार की तरह भहराकर गिर जाऊँ. मगर अब तो मैं खड़ी भी नहीं रह पा रही थी, तो गिरती भला क्या? और फिर कितना गिरती? मैं भी तो एक इन्सान ही हूँ. मेरे पति ने तो जितना चाहा, मुझे नीचा दिखाया. यहाँ तक कि एक लड़की अपने मायके भी आ गयी. तब भी वो इस लड़की को ही दोष दे रहा था कि, “तू अपने माँ-बाप के साथ चली गयी. अत्याचार तो तुमने किया मुझ पर.”

  एक भगवान अपनी दासी पर ख़ुद आरोप लगा रहे थे. मगर दासी भी ऐसी-वैसी नहीं थी. दिल बहुत बड़ा था मेरा. मैंने माफ़ कर दिया था अपने पति को. उसके जनम-दिन पर मैंने उसकी उमर की गिनती के बराबर गिन कर तोहफ़े दिये.

  मेरे लिए क्या मुश्किल था. मेरा पति सिर्फ़ तैंतीस साल का ही तो था. सुबह से लेकर रात तक मैंने तैंतीस तोहफ़े दिये थे. क्योंकि मैं एक औरत थी. और औरत जब प्यार करती है तो आदमी बर्दाश्त नहीं कर पाता है. वहीँ दूसरी तरफ़, जब एक औरत अपने पति से थोड़ा सा प्यार माँगती है, तो पति इतना कंजूस हो जाता है कि क्या कहा जाए और क्या माँगा जाए?

  मैंने अपने पति की सारी ज़्यादतियाँ बर्दाश्त कर ली थीं. मगर मेरे पति को ये बर्दाश्त नहीं हुआ कि मैं उसका घर छोड़कर अपने घर आ गयी. उसने फिर भी ये नहीं सोचा कि, “क्यूँ मैं ऐसा कर बैठी?” मेरा पति बस यही सोचता रहा कि, “मैं तो मर्द हूँ. और एक मर्द कुछ भी कर सकता है. कुछ भी.” शायद इसीलिए तो वो मुझे घर में छोड़कर बाहर ही रहना पसन्द करता था.

  वो पसन्द करता था किसी बाहरवाली को. इसलिये नहीं कि, “वो उसे पसन्द करता था” बल्कि इसलिये क्योंकि “वो सोचता था कि वो एक मर्द है. और मर्द का अगर किसी बाहरवाली के साथ चक्कर न हो, तो वो मर्द ही क्या? इससे अच्छा तो चूड़ियाँ पहन कर घर में बैठ जाए.” जैसा मैं कर रही थी. क्योंकि मैं एक औरत थी. एक नये ज़माने की हिन्दुस्तानी औरत, जो आज भी अपने पति की बेवफ़ाई चुपचाप बर्दाश्त कर रही थी.

  कभी-कभी सोचती हूँ अपने बारे में, तो रोना आ जाता है. मगर वो नहीं आता है. चाहे मैं रो-रो के बेहाल हो जाऊँ, तो भी नहीं... कितनी बार तो मैं रोते-रोते ही सो जाती हूँ. मगर वो मेरे पास नहीं आता है, क्यूँकि वो एक औरत को रोते हुए नहीं देख सकता. जबकि सच ये है कि वो सिर्फ़ मुझे रोते हुए नहीं देखना चाहता. क्योंकि फिर उसे शायद दिखावे के लिए कहना पडेगा कि, “मत रोओ”, जो वो कभी दिल से कहना नहीं चाहता. क्यूँकि मैं रोऊँ चाहे गाऊँ, उसे कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ता. हाँ, अगर उसकी ‘चहेती’ रात के दस बजे भी रोकर उसे बुलाये तो वो कोई न कोई बहाना बनाकर उससे मिलने ज़रूर जाता था.

  जैसे एक दिन उसने कहा कि, “मैं एटीएम से पैसे निकालने जा रहा हूँ” और इस बहाने से वो बिल्डिंग से नीचे उतरा और उस हरामज़ादी से मिल के आया. और जब मैंने पूछा कि, “क्या हुआ? एटीएम ख़राब हो गया था क्या?” तो वो अपनी ग़लती को छुपाने के लिए मुझ पर ही चिल्लाने लगा. और हमेशा की तरह, मैं ख़ामोश हो गयी.

  मगर उस दिन मुझे ये पता चला कि मेरा पति अब मेरा नहीं रहा. वो किसी और का भी था. इसलिये अब वो मेरा नहीं था. क्योंकि पति तो पूरा ही होता है, ‘आधा पति’ क्या होता है? और मुझे ‘आधा पति’ चाहिए भी नहीं था. क्योंकि वो सोता तो मेरे साथ था, मगर उसकी बाहों में मैं नहीं होती थी, इसलिये मुझे कोई दर्द भी महसूस नहीं होता था, और उसे कोई मज़ा भी नहीं आता था. क्योंकि मर्दों को तो औरत को रौंदने में मज़ा आता है. अगर बिस्तर पे औरत हाथ-पैर न जोड़ ले, तो मर्द ख़ुद पर ही शक करने लगता है.

  मगर यहाँ भी वो मुझे ही ग़लत समझता था. वो चाहता था कि मैं चिल्लाऊँ, मगर मैं तो उसकी तरह झूठी नहीं थी. चिल्लाने के लिए दर्द का अहसास भी तो होना चाहिए. मुझे प्यार का अहसास तो होता नहीं था, दर्द तो बहुत दूर की बात थी.

  मगर जो दर्द मुझे हो रहा था, उसका अहसास उसे कभी नहीं हुआ. क्योंकि वो दर्द मेरे दिल में था और मेरा पति मेरे दिल में नहीं रहता था. वो किसी और के दिल में रहता था. बड़ी अजीब बात है, जब हम किसी को प्यार करते हैं, तब हम कहते हैं, “तुम मेरे दिल में रहते हो, चाहे तुम मुझे अपने दिल में रखो, या मत रखो.” मगर यहाँ कहानी कुछ और ही थी. ना तो वो मुझे अपने दिल में रखता था और ना ही मेरे दिल में रहना चाहता था.

  कभी-कभी सोचती हूँ, “ऐसा क्या नहीं था मेरे पास, जो मेरा पति, मेरा होते हुए भी, कभी मेरा नहीं हो पाया?” कभी-कभी मैं ये भी सोचती हूँ, “क्या मैं एक लड़की नहीं? या मैं एक औरत नहीं?”

  और इसी कशमकश में, मैं कभी-कभी अपने औरत होने के सबूतों से पूछती हूँ, “क्या तुम लोग काफ़ी नहीं? मेरे पति को क्या चाहिए? तुम ही बता दो?” मगर हड्डी और माँस के सबूत क्या बताते. वो सब भी मेरी तरह ख़ामोश हो चुके थे. सच कहूँ, तो मेरे पति ने, मेरे साथ कम, मेरे अन्दर मौजूद लड़की, जो अब कहने को औरत बन चुकी थी, के साथ ज़्यादा ज़ुल्म किया था. एक पति जब नामर्द निकलता है, तो पूरी दुनिया उसे कोसती है. मगर जब एक सही-सलामत औरत को, कोई इस तरह नज़र-अन्दाज़ करता है, तब ये दुनिया कुछ नहीं कहती है. नामर्द की तरह औरत के लिए “नाऔरत” शब्द नहीं बना है. औरत तो सिर्फ़ ‘बेचारी’ होती है. मेरी तरह.

  तभी तो, मैं बेचारी समझ ही नहीं पायी कि जिस सीधे-सादे आदमी के साथ मेरी शादी हो रही है, वो सचमुच में सीधा-साधा नहीं है... बल्कि वो तो तैयारी कर रहा था कि किस तरह वो मुझे, और अपनी ‘मनपसन्द’ को एक साथ सँभालेगा.

  मगर अब मुझे उससे दूर होकर ये समझ में आता है कि दुनिया का हर वो आदमी, जो अपनी बीवी से बेवफ़ाई करता है, बहुत बड़ा ‘बेवकूफ़’ होता है. ये आदमी ये नहीं सोचता है कि घर में रहने वाली को भी थोड़ा प्यार दूँ ताकि इसे मेरी ‘बाहरवाली’ के बारे में पता न चले. मगर ये ‘बेवकूफ़’ आदमी, जब अपनी ‘मनपसन्द बाहरवाली’ के साथ होता है, तब इसे अपनी बीवी की याद भले ही एक बार भी न आए, मगर यही ‘बेवकूफ़’ आदमी जब अपनी ‘बीवी’ के साथ होता है, तब इसे अपनी ‘मनपसन्द बाहरवाली’ की याद और ज़्यादा आने लगती है.

  और इस ‘बेवकूफ़’ आदमी को ये नहीं पता कि औरत ने ही आदमी को पैदा किया है, और एक औरत, आदमी की नस-नस से वाक़िफ़ होती है. एक आदमी, कभी एक औरत का शरीर उस तरह से नहीं देख पाता है, जिस तरह एक औरत, आदमी के शरीर को जानती है, समझती है...

  जिस रास्ते से मर्द अपनी मर्दानगी दिखाता है, उस रास्ते में जान एक औरत ही डालती है. मगर कौन समझाये इस ‘बेवकूफ़ आदमी’ को. ये तो बस कुत्‍ते की तरह दुम हिलाता हुआ जीभ निकाल लेता है, जहाँ भी कोई लड़की देखी. इसीलिये तो सब लड़कियाँ कहती हैं कि, “आदमी कुत्‍ता होता है.”

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