Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 1, अंक16, जुलाई(प्रथम), 2017



‘‘ इंसान की इंसानियत ’’

प्रेम गुर्जर


   गाँव से शहर को जाते मुख्य रास्ते पर एक घना एवं छायादार आम का पेड़ लगा हुआ था, जिसके नीचे एक बड़ा चबूतरा बन हुआ था। उस रास्ते से गुज़रा हर मुसाफ़िर कुछ समय के लिए इस वृक्ष की छाया का आनंद जरूर लेता। पेड़ के नीचे बने आरामदायक चबूतरे पर बैठकर अपने सफर की थकान मिटाता, सुस्ताता और फिर अपने रास्ते चल देता।

   अक्सर लोग इस पेड़ के नीचे बैठकर घण्टों बातें किया करते। एक दूसरे की पीठ पीछे बुराई करते किन्तु पेड़ सदैव उनकी सेवा में तत्पर रहता। उसे इंसान की बातों से कोई वास्ता नही था। वह स्थिर खड़ा अपनी शाखों से निरंतर अतिथियों को हवा एवं अपने पत्तों से छाया देने में कोई कसर नही छोड़ता।

   वैसे तो पेड़ को लोगों की बाते सुनने का कोई शौक़ नही था। ऊपर से वह ‘प्राईवेसी’ का भी समर्थक था।

   एक दिन एक तोता काफ़ी समय से उस पेड़ पर बैठा यह सब दृश्य देख रहा था। किस प्रकार से आम का पेड़ मुसाफ़िरों की सेवा में समर्पित था। तोते को एक हरकत सुझी, उसने पेड़ को छेड़ते हुए पूछा-

   ‘‘क्यों भाई बड़े भले बनते फिरते हो। लोगों को छाया देते हो, शीतल हवा देते हो, थके मुसाफ़िर को दो पल सुकुन के देते हो।’’

   ‘‘तो क्या हुआ?’’ तोते की बात सुन पेड़ ने उसकी तरफ ध्यान दिये बिना ही कहा।

   ‘‘सुना है मनुष्य बड़ा कृतज्ञ प्राणी है, तो तुम्हारी सेवा के बदले कृतज्ञता से तुम्हारा भण्डार तो भर देता होगा?’’ तोते ने सर खुजलाते हुए पूछा।

   ‘‘तुम कहना क्या चाहते हो ‘मिठु’?’’ पेड़ को तोते का इस तरह मजाक उड़ाना पसंद नही आया। उसने भी तपाक् से तोते को ‘मिठु’ कह कर अपना कलेजा शांत किया।

   ‘‘लगता है लोगों को शीतलता देते-देते तुम बड़े चिड़चिड़े हो गये हो यार। मैं तो मज़ाक कर रहा था।’’ तोते को इस प्रकार से पेड़ द्वारा चिड़ना अज़ीब लगा। उसने सोचा चलो छोड़ो कही ज्यादा चिड़ जायेगा तो अपनी डाले हिलाकर मुझे ही भगा देगा।

   पेड़ ने भी स्वयं को संभाला। अक्सर आस-पास के पेड़ों की बिरादरी में इस पेड़ की बड़ी इज्ज़त थी। सभी पक्षी उसके धैर्य की प्रशंसा करते थे। यहाँ तक की सभी वृक्षों ने उसे अपना नेता भी चुन लिया था।

   ‘‘ऐसी बात नही हैं प्यारे’’ पेड़ ने शांत होकर लंबी सांस लेते हुए कहा, ‘‘लोग यहाँ आकर अपनी सारी मुसीबतंे भुल जाते हैं। शांति से बैठकर कुछ पल बिताते हंै। खुश हो जाते हैं। यही मेरेे लिए पर्याप्त है।’’ पेड़ ने कहा कि इतने में गाँव के दो बुजुर्ग उसके नीचे चबूतरे पर आकर बैठ गये।

   पेड़ एवं तोता दोनों ही चुप हो गये। पेड़ अपना पूरा ध्यान उन्हें अच्छी से अच्छी छाया देने में लगाने लगा। अपनी डालों से उन तक शीतल हवा पहुॅचाने लगा। पेड़ भुल गया था कि तोता अभी भी बैठा हुआ है।

   तोते ने सोचा ‘आखिर ये इतनी शिद्दत से मुसाफिरों की सेवा करता हैं। भला आज मैं भी रूक कर देखु, लोग क्या प्रतिक्रिया करतंे हैं।’

   नीचे बैठे दोनों बुजुर्ग आपस में बातें करने लगे -

   ‘‘आजकल मौसम का कोई ठिकाना नही। कब सर्दी, कब वर्षा, कब गर्मी पड़ने लग जाती है?’’ एक बुजुर्ग ने अपनी जब से पुरानी आधी जली हुई बीड़ी निकालते हुए कहा।

   ‘‘हाँ ! हमारे ज़माने में क्या दिन हुआ करते थे। जब सर्दी पड़ती थी तो सिर्फ सर्दी ही पड़ती थी। अब देखो ना, कल ही बारिश आयी थी और आज कितनी तेज गर्मी पड़ रही है।’’ दूसरे बुजुर्ग ने अपनी जेब से माचिस निकाल कर पहले की तरफ कर दी।

   ‘‘पेड़ भी अब वैसी छाया कहाँ देते? अब इसे ही देख लो कितना मोटा हो गया है परन्तु ठीक से छाया तक नही दे रहा।’’ पहले वाले बुजुर्ग ने बीड़ी सुलगाकर धुंआँ पेड़ की तरफ छोड़ते हुए कहा।

   दोनों की बाते सुन पेड़ ने अपने पत्ते जल्दी-जल्दी हिलाने शुरू कर दिये।

   ‘‘हाँ !’’ दूसरा बुजुर्ग उस पेड़ की तरफ देखते हुए बोला, ‘‘देखो तो सही कितना घना है फिर भी ठिक से छाया नही दे रहा। ऐसे पेड़ तोे धरती पर बोझ है।’’

   ‘‘इसको तो काटकर लकड़ी जलाने के काम में लेना चाहिए, कितना मोटा पेड़ है?’’ दूसरे ने पेड़ के तने की तरफ देखते हुए कहा। पेड़ ने जैसे ही यह बात सुनी उसके दिल की धड़कन बढ गयी किन्तु उसने हवा करना जारी रखा।

   दोनों बुजुर्ग कुछ देर तक उस पेड़ की बुराई करते रहे। तोता उनकी बाते ध्यान से सुनता जा रहा था। फिर कुछ देर बाद दानों वहाँ से उठे। उनमें से एक बुजुर्ग उस पेड़ की डाल की तरफ बढ़ा जो काफी नीचे तक लटकी हुई थी।

   तोते को लगा अब शायद यह बुजुर्ग जाते-जाते इस पेड़ को कुछ तो धन्यवाद दे सकता है किन्तु दूसरे ही पल उसने देखा तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गयी।

   उस बुजुर्ग ने पेड़ की वह टहनी यह कहते हुए मोड़कर तोड़ दी कि ‘‘मेरी बकरियों को खिलाने के काम आयेगी।’’

   कुछ ही देर में दोनों बुजुर्ग वहाँ से आगे निकल गये। पेड़ उनकी बातें सुनकर थोड़ा उदास हो गया किन्तु अभी तक धैर्य बनाए रखा। उसे अभी भी नही पता था कि तोता चुपके से यह सब सुन रहा था।

   तभी अचानक एक पुरूष व एक महिला मुसाफ़िर जो दिखने में पति-पत्नी लग रहे थे, उस पेड़ के नीचे आकर बैठे, महिला बोली -

   ‘‘आपकी माँ को समझा देना मुझसे ताने में बातें नही करे !’’ महिला की आवाज थोड़ी तेज थी, ‘‘मैं जब से ब्याह के आई हूॅ तब से महारानी साहिबा के बड़े ठाठ हैं। बना बनाया खा-खाकर इस पेड़ की तरह मोटी होती जा रही है। ऊपर से ताने मारना नही छोड़ती।’’ बोलते हुए औरत की सांसे फुल गयी।

   ‘‘तुम तो शांत हो जाओ शांता की माँ। तुम क्यों इस पेड़ की तरह अकडू बन रही हो? घर-परिवार में छोटी-बड़ी बातें होती रहती हंै।’’ आदमी ने पत्नी की बातों का रटा-रटाया जवाब देते हुए पेड़ की तरफ देखा।

   उसे एक आम नीचे लटकता हुआ दिखाई दिया। उसने खड़े होेकर उस डाल को पकड़ा जिस पर आम लटक रहा था। जोर लगाने से आम समेत पूरी डाल टुट गयी परन्तु आदमी नीचे गिर पड़ा। उसकी इस हरकत को देखकर औरत बोली-

   ‘‘कितने बड़े हो गये हो पप्पु के पापा पर अभी तक अकल नही आई। डाली टुटी तो कोई बात नही पर अपने हाथ-पैर तोड़ देते तो।’’

   आदमी ने गिरा आम उठाते हुए विजयी मुस्कान में कहा, ‘‘अरे तुम तो पगला गयी हो। किसी ज़माने में हमने पत्थर के एक निशाने से इसी पेड़ से कई आम तोड़े थे, किन्तु अब इस पेड़ में वह बात नही रही।’’

   पेड़ निरंतर उनकी बातें सुनते हुए अपने पत्तों से हवा करते जा रहा था। बगल में बैठा तोता यह दृश्य चुपचाप देख रहा था। उसने स्वयं को छुपाये रखा। क्योंकि अगर पेड़ को पता चल जाये कि तोता यह सब सुन रहा है तो पेड़ कब का तोते को उड़ा दे।

   कुछ देर पति-पत्नी लड़ते रहे, फिर उठकर वहाँ से चल दिए। उनके जाते ही पिछे से कुछ लड़कों का झुण्ड उस पेड़ की तरफ आया। सभी ने आस-पास से पत्थर उठाये एवं चुन-चुन कर पेड़ पर लगे आम के फलों पर प्रहार करना शुरू किया। एक पत्थर का किनारा तोते को छुकर निकला। तोते के ‘तोते उड़ गए’ किन्तु आज उसने ठान रखी थी कि वह अंत तक डटा रहेगा।

   लड़कों के चले जाने के पश्चात् एक चरवाहा अपनी भेड़ों को चराते हुए आया। कुछ देर तक पेड़ के नीचे बैठा। जब देखा की उसकी सारी भेड़ें वही आस-पास पेड़ की छाया में सुस्ता रही हैं तो चरवाहा भी सो गया। पेड़ की शीतल छाया में उसको झपकी लग गयी। तोते ने सोचा यह जरूर पेड़ का धन्यवाद देगा, इसी प्रतीक्षा में छुपकर बैठा रहा।

   जब चरवाहे की आँखें खुली तो उसने स्वयं को तरो-ताजा महसूस किया। आस पास चरती अपनी भेड़ों को देखा फिर आम के पेड़ की तरफ देखा। तोते ने सोचा बस अब शुक्रिया अदा करने ही वाला है तभी अचानक चरवाहा उठ खड़ा हुआ।

   उसने बाॅस की लकड़ी हाथ में ली जिसके ऊपरी छोर पर एक दराती बंधी हुई थी। लकड़ी से पेड़ के नीचे वाली टहनियों को काटने लगा एवं जोर-जोर से आवाज़ देकर अपनी भेड़ों को पास बुलाने लगा।

   तोते से यह दृश्य देखा नही गया। उसने सोचा चलो जाते-जाते ही सही चरवाहा पेड़ को कृतज्ञता तो अर्पित करेगा। जब चरवाहा रवाना हुआ तो एक बार फिर पेड़ की तरफ देखा। अब तोता खुश था क्योंकि उसे पूरा यक़ीन हो चला था कि यह इंसान धन्यवाद जरूर देगा।

   चरवाहे ने एक पत्थर उठाया एवं जोर से आम पर निशाना लगाया। आम नीचे गिर गया, उसने उठाया एवं मंुह लगाकर चखा, तो वह अभी भी खट्टा था। चरवाहे ने गुस्से में आकर वही आम उसी पेड़ पर दे मारा एवं आगे बढ गया।

   तोते ने देखा पेड़ की आँखों से आँसू बह रहे थे पर वह अभी भी चरवाहे को हवा कर रहा था। तोते से भी अब रहा नही गया, वह भी रो पड़ा। इंसान की इंसानियत को देखकर।

www.000webhost.com

कृपया अपनी प्रतिक्रिया sahityasudha2016@gmail.com पर भेजें