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वर्ष: 1, अंक 16, जुलाई(प्रथम), 2017



सावन गीत-1

सुशील शर्मा


घन घन घन घन गरजे बदरवा
पिया तोसे लिपट मैं जाऊं
झर झर झर झर बरसे सावन
पिया तोहे मैं गले लगाऊं।

बैरी सवनवा ऐसो तारे
बूंदों में अगन सी डारे।
बैरी न समझे मेरी बेचैनी।
पिया संग हो रई सेना सैनी
रिम झिम बरसे सवनवा।
घन घन घन घन गरजे बदरवा
पिया तोसे लिपट मैं जाऊं।
झर झर झर झर बरसे सावन
पिया तोहे मैं गले लगाऊं।
 

प्रीतम न समझें नैनों की भाषा।
क्या है मेरे मन की अभिलाषा।
सावन के मौसम में ऐसे रूठे।
मिलन के वादे हो गए झूठे।
हमरी ने माने बैरी सजनवा।
घन घन घन घन गरजे बदरवा
पिया तोसे लिपट मैं जाऊं
झर झर झर झर बरसे सावन
पिया तोहे मैं गले लगाऊं।

पिया के नाम की मेहंदी लगाई।
फिर भी न मोहे देखे हरजाई।
व्याकुल तन मन जियरा तरसे।
अब की बरस जो सावन बरसे।
असुंओं संग बह जाए कजरवा।
घन घन घन घन गरजे बदरवा
पिया तोसे लिपट मैं जाऊं
झर झर झर झर बरसे सावन
पिया तोहे मैं गले लगाऊं।
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