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वर्ष: 1, अंक 16, जुलाई(प्रथम), 2017



जो नहीँ मिला, सो नहीँ मिला

डॉ० अनिल चड्डा


जो नहीँ मिला, सो नहीँ मिला,
उसका करना क्यों है गिला,
ये जीवन है मेरे प्यारे,
चलता है यूँ ही सिलसिला।
 
कोई बात बने या न बने,
कोई जीत मिले या न मिले,
कहीं रुकना नहीं दिल हार कर,
कमल ही कीचड़ में खिले,
दुविधा को अपनी छोड़ दे तू,
पर्वत को सुई से हिला।
 
ये नोच-कचोट का खेल है जी,
कोई खेल सके तो खेल ले जी,
गर सहन न हो कोई बात कभी,
तो चुप करके ही देख ले जी,
बस चल तू अपने  रास्ते,
दूजों को देख न बिलबिला।

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