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वर्ष: 1, अंक 16, जुलाई(प्रथम), 2017



बुंदेली ग़ज़ल-2

सुशील शर्मा


अकड़ अकड़ के खूब घूम हैं तुम का कर लेहो।
मतवाले से लटक झूम हैं तुम का कर लेहो।

हमरे मन में जो जो आ हे सो हम कर हैं।
मन के माफक हम बतयें हैं तुम का कर लेहो।

सत्ता की गद्दी पर हैगो हमरो कब्जा।
हम अपनी मर्जी के मालक तुम का कर लेहो।

 पहन पहन के झक झक धोरो कुर्ता
मंच से हम भाषण दें हैं तुम का कर लेहो।

वाद विवाद न हमसे करियो नातर मर हो।
मूढ़ों में हम लट्ठ मार हैं तुम का कर लेहो।

खेत खिरेंना से हमें का लेवो देवो।
गोली से हम भुंजवेहे तुम कर लेहो।

शब्दार्थ: धोरो-सफेद मूढ़ों-सिर नातर-नही तो खिरेंना-खलिहान भुंजवेहे-भून देंगे
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