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वर्ष: 1, अंक 16, जुलाई(प्रथम), 2017



बेकस दिल ने आख़िर ये माना

गुलाब जैन


बेकस दिल ने आख़िर ये माना |
आसां नहीं है उनको भुलाना  |

लुटा दें भले हम सब उनकी ख़ातिर,
फिर भी ना छोड़ेंगे हमें आज़माना |

हम तो मिले थे चुपचाप उनसे,
ना जाने दुनिया ने कैसे ये जाना |

देख के उनकी आँखें नशीली,
कौन जाए कम्बख़्त मैखाना |

चारों तरफ़ थे ग़म के अँधेरे,
उन्हीं से हमने सीखा मुस्कुराना |
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