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वर्ष: 1, अंक 16, जुलाई(प्रथम), 2017



तुमको तो मैं माफ करूँ

डॉ० अनिल चड्डा


तुमको तो मैं माफ करूँ, दिल को कैसे साफ करूँ,
आग लगाई दिल में जो, उसको कैसे राख करूँ ।
 
ख्याल यही बस आते हैं, बहुत अनकही बातें हैं,
जो न समझे भावना को, उससे कैसे बात करुँ।
 
अहं का तांडव इतना है, शब्द बना इक फतवा है,
दिन को गर कोई रात कहे, दिन को कैसे रात करूँ।
 
मेरी फितरत इंसानियत है, उनकी तो हैवानियत है,
अपनी फितरत के रहते, पीठ में कैसे घात करूँ।
 
हार-जीत चलती रहती, जीवन-नैया बहती रहती,
नतमस्तक हो जो बैठा हो, उसकी कैसे मात करुँ ।
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