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वर्ष: 1, अंक 16, जुलाई(प्रथम), 2017



तुम्हारे बिना

डॉ० अनिल चड्डा


तुम्हारे बिना भी जिंदगी को रास तो आना ही था,
किसी न किसी को तो अपना  बनाना ही था।
 
ख्वाहिशें तो जवां रहेगी, जब तक साँस चलेगी,
कभी कुछ पाना, तो कभी कुछ खोना ही था।
 
सवालों के घेरे में क्यों परेशान रखते मन को तुम,
मन को तेरे चैन था, हमने  तो गँवाना ही था।
 
ऐसा तो नहीं कभी कुछ गलत किसी ने किया न हो,
टटोलते खुद को गर, दोष खुद में पाना ही था।
 
कोई वास्ता न होता दुनिया से गर ‘अनिल’ को भी,
जीना दुश्वार उसका जग में हो जाना ही था।
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