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वर्ष: 1, अंक16, जुलाई(प्रथम), 2017



खेमी
गुजराती कहानी का हिंदी अनुवाद


लेखक: रा.वि.पाठक `द्विरेफ’
अनुवादक: डॉ.रजनीकान्त एस.शाह


   ``अरे। ओ, ऐसे कितनी दियासलाइयाँ ख़राब करनी हैं? एक बाक्स दो दिन तो चला।’’धनिया ने बीडी जलाने के लिए एक के बाद एक पांच तीलियाँ जला दी थी। इसलिए खेमी ने कहा।

  ‘‘पर देख तो सही,यह पवन भी कितना ऊलटा हुआ है, दियासलाई जलने ही नहीं देता! धनिया ने पुन: बाकस खोला।’’

  ‘‘ले चल, मैं कपड़ा धरती हूँ।’’खेमी ने घूँघट का छोर लम्बा खींचकर धनिया के पास जाकर उसके मुंह के पास पवन को रोकने के लिए कपड़ा धर दिया। धनिये की दियासलाई जली। उसके साँस अन्दर लेने और छोड़ने के अनुरूप दियासलाई का प्रकाश झिलमिलाता था। धनिया पत्नी के जवान,भरा हुआ,गेहुआँ फिरभी उज्ज्वल,बड़ी तेजस्वी आँखोंवाले,नाक में बडे कांटेवाले मुख को देखता रहा। बीडी की लहजत से ज्यादा वह अपनी नवोढ़ा के सौंदर्यपान में मस्त हो गया। बीडी के जलने पर खेमी अपनी मूल जगह पर जाना चाहती थी कि धनिया ने उससे कहा:

  ‘‘ले,मेरी कसम,यदि दूर गई तो।’’

  ‘‘पागल मत बन,पागल’’ –कहती हुई खेमी अपनी जगह पर गई।

  ‘‘तुम्हारी कसम,खेमी, तुम बहुत प्यारी लगती हो !’’

  ‘‘फिर वही बात, इतने सरे लोग यहाँ है इस बात का कुछ होश है भी तुम्हें?’’

  ‘‘वे लोग तो खाना खाने में लगे हैं हमारी ओर देखने की किसे पड़ी है?’’कौन नवविवाहित जोड़ा ऐसा नहीं सोचता?

  आज घनिया के ग्राहक एक बनिए के घर ज्ञाति-भोज हो रहा था। अत: दोनों अच्छा खाने की ख़ुशी में पाखाने की पायदान पर बैठे बैठे एकांत गोष्ठी कर रहे थे। ज्ञाति में गन्दगी होने से बचाने के लिये सेठ ने उसे वहां बिठाया था। दोनों ने कुछ दिन पहले शादी के समय पहने हुए कपडे पहने थे। धनिया ने माथे पर अंगोछा,नीचे रेशमी जाकेट और पैर में जुराब पहनी थी। खेमी ने एक मरी हुई सुहागिन सिठानी के अंग पर से स्मशान में हटा दिया गया रेशमी वस्त्र पहना हुआ था।

  धनिया ने बीडी की एक फूंक लेकर कहा: ‘‘खेमी, तुम्हारी माँ ने जो भी माँगा होता,वह देकर भी तुम से शादी रचाता।’’

  ‘‘पर क्या मेरी माँ ने कब तुम से एक पाई तक ली है? ऊलटे मैं तो तुम्हारे घर में लेकर आई हूँ, मेरी माँ ने तो ब्राह्मण सा विवाह करवाया है।’’

  ‘तुम्हारी माँ तो बड़ी भली औरत पर तू कैसे इतनी बुरी निकली!’’

  ``लो, मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?’’

  ‘‘देखो ना,पहले तो ब्याहते ब्याहते कितने नखरे किये? दारू न पिये,गाली-गलौज न करे और कभी हाथ न चलाये तो शादी करूँ, अन्यथा शादी नहीं करूँगी।’’ और कभी किसी दिन ऐसा किया तो उसे छोड़कर चली जाउंगी। ऐसा कहीं होता है?’’

  ‘‘क्यों नहीं हो? वह दारू पीकर आये और उधम मचाये और नहीं बोलने जैसा बोले तो मुझ से यह सहा नहीं जायेगा और देखो, वह कोई और होगा जो मार खाए,मैं नहीं!’’

  धनिया खेमी के सत्य और प्रताप के आगे सुस्त पड गया। ‘‘ठीक है,पर मैं कहाँ पीने के लिए जाता हूँ कि तुम इस प्रकार बढ़-चढ़कर बोल रही है। चाहे कुछ भी हो, मुझे तो तुमसे शादी करनी ही थी।’’तुम छोटी थी,कच्छा बांधकर तुम माँ के साथ झाड़ू लगाने के लिए निकलती थी तब से तुम मुझे बहुत भाने लगी थी। तुमने यह कच्छा बांधना कहाँ से सिखा, खेमी?’’धनिया ने खेमी की छाती पर बंधी हुई गांठ को छुआ।

  ‘‘पडधरी में तो सभी औरतें काम करते वक्त इसी प्रकार कच्छा बांधती हैं।’’ खेमी की माँ मूल काठियावाड(गुजरात का सौराष्ट्र क्षेत्र।)में पड़धरी की निवासिनी थी। अकाल के समय में वह खेमी को लेकर यहाँ रहने के लिए आ गई थी। ‘‘पर ओ धनिया,तुम दारू क्यों पीते हो?’’दारू में ऐसा तो क्या है ऐसा? तुम तो कहते थे कि दारू तो कडुआ लगता है।’’

  ‘‘खेमी, जब किसी दिन जी भरी लगे,उस दिन पीना पड़ता है। बहुत थक गए हों और जी को अच्छा नहीं लगे तब पीने से ठीक हो जाता है।’’ खेमी कुछ देर मौन रही। उसे पुन: अपना सौभाग्य और सत्ता सुनाने की इच्छा हुई। उसने पूछा: ‘‘अय धनिया, मुझे यदि कहीं और ब्याह दिया होता तो?’’

  ‘‘अरे, मैं नहीं देख रहा कि किसी में इतनी हिम्मत हो और वह तुमसे शादी करे। कहीं से भी तुम्हें उठा ले जाता।’’

  खेमी ने कहा, ‘‘चल,बस कर, इतना अभिमान मत कर। इस दुनिया में एक से बढ़कर एक सवाये भरे पड़े हैं।’’

  ऐसे में ज्ञाति-बिरादरी में कोलाहल मच गया। एक कुत्ते ने वहां घुसकर एक थाली जूठी कर दी। उसे मार-पीटकर बहार भगा दिया। सेठ चिढ गया। उसने नाई को बहुत डांटा। नाई ने हरिजन को दोषी ठहराया और सेठ का सारा गुस्सा हरिजन पर उतरा। ‘‘बड़े गवंडर होकर बैठे हैं,हाथ में बीडी लिए! और कुत्तों को हांके नहीं जा रहे हैं। उठो,यहाँ से,हरामजादी के।।।।’’ उसने बस मारना ही बाकी रखा।

  धनिया और खेमी को बहुत दु:ख हुआ। उनके रंग में भंग हुआ। उनका सारा उल्लास ख़त्म हो गया। दोनों कुछ भी बोले बिना उठाकर जाने लगे। कहाँ जाना तय नहीं था पर खेमी स्वाभाविक ही मन को कुछ विनोदपूर्ण आनंद मिले ऐसे दृश्यों की ओर बढ़ने की प्रेरणा से रीचीरोड़ पर चलने लगी। धनिया को बहुत ठेस पहुंची थी। खेमी उसे आश्वस्त करने लगी। धनिया वहां कुछ भी बोल नहीं पाया था। वह काफी देर बाद यहाँ बोला : ‘‘कुत्तों को भगाने का काम तो हज्जाम का था। तो मुझ पर क्यों इतना गरजे?’’खेमी ने पुन: आश्वासन दिया। धनिया ने अपने मन में जो असली दु:ख था, उसे बताया: ‘‘और कुछ नहीं, तुम्हारे देखते वह ऐसा बोल गया,यह मेरे लिए असह्य है।’’

  खेमी गहरी सोच में उतर गई। उसने धनिया को बातों में रोक दिया और धनिया का अपमान ज्यादा हुआ,यह अन्याय उसे व्यग्र करने लगा। धनिया गमगीन होकर मूक भाव से चलता था,इसलिए उसे भारी दु:ख अनुभव होता था। राह चलते चलते रायखड के पीठे की तरफ जाने का रास्ता आया। खेमी को याद आया कि धनिया जब उद्विग्न होता है तब उसे दारू पीने से ठीक होता है। उसने नारी सहज कोमलता से अठन्नी निकलकर धनिया को देते हुए कहा:

  ‘‘अब,ऐसे कब तक तुम चुप रहोगे?जा,वहां जाकर दारू पी ले,जल्दी वापस लौट आना।’’

  खेमी इंतजार करती हुई खड़ी थी। उसने खुद दारू नहीं पीने की शर्त रखी थी और खुद दारू पीने के लिए पैसे दिए। यह अच्छा नहीं किया। ऐसी शंका उसके मन में होने लगी। ऐसे में धनिया खुश होता हुआ वापस आया और कहने लगा कि:

  ‘‘खेमी,अब मुझे ठीक लगने लगा है। मैं नहीं कह रहा था कि दारू पीने से मुझे ठीक हो जाता है? खेमी ने कहा: ‘‘अब उस बात को छोड़। अब ख़बरदार,यदि तुमने फिर कभी पी तो! घर से निकाल बहार कर दूंगी।’’

  ‘‘ना, खेमी, मैं कभी नहीं पिऊंगा। तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो। अब बनिए की जाति जाये जहन्नुम में। मैं दारू पीता हूँ पर मुझे तो चढती नहीं है। क्या अभी भी मेरे बोलने में कोई फर्क नजर आता है? तुम तो बेकार ही मुझ से डर रही हो। चाहे कैसी दारू पीऊँ फिरभी तुम्हें कभी भी नहीं पिटूँगा। तुम मुझे कितनी प्यारी लगती हो।।’’ऐसे बडबडाते हुए धनिया चलने लगा। खेमी चूपचाप उसे लेकर इन सारी घटनाओं पर विचार करती हुई घर पहुंची।

+ + +



  शाम के वक्त,जिस कच्छे पर धनिया अहमदाबाद में मोहित हुआ था उस कच्छे को खेमी बांधती है,पर अभी वह अहमदाबाद में नहीं है। अभी उसके पास धनिया नहीं है। छ:महीने हुए उन दोनों को छोड़े हुए। उपरोक्त घटना के बाद,दारू नहीं पीने की शर्त के बावजूद,कुछ तो खेमी बर्दाश्त कर लेगी, ऐसे भरोसे के बलबूते,शर्त का पालन करना तो पत्नी के आगे कमजोरी दिखाने जैसा लगने के कारण,मुझे दारू नहीं चढ़ रही है,ऐसे कुछ मिथ्याभिमान और कुछ ख़राब सोहबत के कारण वह दारू पीने लगा था। खेमी ने उसे कईबार धमकाया,तिरस्कृत किया,छोड़कर भाग जाने के डांट भी पिलाई;पर धनिया ने उसे गीदड़भबती ही समझा और उसकी परवाह नही की। आख़िरकार एक दिन वह ज्यादा दारू चढ़ाकर आया और ``मुझे छोड़कर किसके साथ जानेवाली है’’-ऐसे घमंड के उसने खेमी को पीट दिया। दूसरे दिन खेमी चल पड़ी। उसकी माँ मर गई थी। अत: वह नडियाद गई और भंगियों के उपरी ऐसे परसोत्तम नामक म्युनिसिपल कारकुन को अपनी पगार में से रिश्वत देने का वायदा करके नौकरी ले ली। नडियाद में उसे मनमौजी समझा जाता था। सारे हरिजन उससे मशखरी करते थे,पर खेमी के दिल में धनिया को छोड़ने का गहरा दर्द रह गया। अहमदाबाद से आनेवाले सभी भंगियों से वह धनिया की खैर-खबर पाने के लिए बड़ी आतुरता के साथ पूछती रहती थी। वह यह भी जानती-समझती थी कि यदि वह धनिया के पास वापस जाएगी तो उसे पुन: बड़े प्यार से रख लेगा पर उसकी ऐसी टेक थी कि धनिया बुलाये तभी जाना है-धनिया उसे वापस बुला ले इस आशय से उसने अनेक मन्नतें रखी थी फिरभी धनिया की ओर से बुलावा नहीं आया था। अत:वह निराश हो चली थी और उस निराशा से उत्तेजित होकर अपने मन की सारी खीज रिश्वतखोर परसोत्तम पर निकालती थी। उसने उसे चिढ़ाने के गीत जोड़ लिए थे।

  खेमी झाड़ू लगा रही थी वहां पास से मंगी ने झाड़ू मारते हुए कहा:`` अरी,मंगी वह गीत गाओ।

  खेमी धनिया के विचारों में खोयी हुई थी। उसने सहज भावसे कहा-`तुम ही गाओ ना!’’

  मंगी को धनिया जैसा गाना आता नहीं था। उसने कहा,``पर उसका चौथा बोल मुझसे जमता नहीं है।’’

  ``तुम्हें गाना नहीं आता होगा।’’

  ``तब तुम ही गाओ ना।’’

  खेमी रंग में आ गई। उसने गाया:

``ओरो आव्यने केशला,तारो ओशलो कूटुं।;
ओरो आव्यने केशला,तने पाटुए पीटूँ।
ओरो आव्यने केशला,तने धोकने धीबुं;
ओरो आव्यने केशला,तारे पुंछडे लिम्बु।’’
(अर्थात केशव(केशला) पास आ,तुम्हारी छाती पिट दूँ, केशव(केशला) पास आ,तुम्हें लतियाउं,
केशव(केशला) पास आ,तुम्हारी लठ्ठ से पिटाई करूँ, केशव(केशला) पास आ,तुम्हारी दूम पर निम्बू रख दूँ)



  ‘‘ले,इसमें क्या जम नहीं रहा है?’’

  ``पर यह तो जोड़ बिठाया ऐसा कहा जायेगा। पूंछ पर निम्बू ऐसे थोड़े ही कहा जाता है।’’

  ``लेकिन मूंछ होगी तभी तो निम्बू धरेगा! इसलिए यह तो दूम पर नींबू टिकाता है।’’

  मंगी खडखडाकर हंस दी। परसोत्तम के गौर,छोटे कपारवाले लम्बे मुंह पर भूरी,हलकी सी,और छोटी मूंछ जैसा नहीं दिखता था।

  दोनों रंग में आकर गाने लगी कि वहां से परसोत्तम निकला। उसने माथे पर रोयेंदार टोपी पहनी थी। नीचे दिखाई देनेवाले कमीज पर काला हाफकोट पहना था और हाथ में एक पतली छड़ी थी। उसे वह जुते से खेलते हुए चल रहा था। उसने गाया जा रहा गीत सुना। उस गीत में उसका नाम तो नहीं था।,उसे किसीने प्रत्यक्ष रूप से कहा नहीं था। फिरभी काव्य विवरण के किसी गूढ़ सिद्धांत से वह समझ गया कि गीत उसीके लिए ही गया जा रहा था।’ मन ही मन साक्षी है।’-यह सूत्र जीवन के किसी भी क्षेत्र की अपेक्षा चिढाने में सब से सही सत्य ठहरता है। वह चिल्लाया:``ओ हरामखोरो काम करो,काम!क्यों इतना जोर से गाये जा रही हो?’’

  मंगी खिसिया गई।खेमी ने उत्तर दिया:``गाते हैं,पर देखते तो हो ना कि हाथ तो काम कर रहे हैं!’’

  ``हरामखोर,मुझे जवाब देती है? अपने साहब का अपमान करती है?’’

  ‘‘पर मैं आपके नाम पर कहाँ गा रही हूँ?’’

  ``तुम सारे गाँव में गाती रहती हो और मेरा अपमान करती हो,क्या मैं यह नहीं समझता?’’

  मंगी की ओर मर्मभरी नजर से देखकर खेमी ने कहा:`` ले अरी! क्या मैं पशाभाई के नाम पर गाती हूँ? मैं तो अहमदाबाद में केशला नामक एक मुकादम था जो भंगियों का पैसा खाता था, उसके नाम पर गा रही हूँ।’’

  ``हरामखोर,मुझे समझाने चली है? मुकादम का अपमान करती है? क्या तुम नहीं देखती कि हम अपने अधिकारियों का मान रखते हैं? और ऊपर से तुम जबान चलाती हो?

  `` भाईसाहब....!’’

  ``बस कर, अब ज्यादा जबान मत चला। मुझे और भी बहुत काम देखने हैं। इस पर अंगूठा टेक दे तो तनख्वाह दे दूँ।’’उसने सामने चौकी पर पत्रक रखा। मंगी ने पहले अंगूठा टेक दिया। बाद में उसने खेमी से अंगूठा टेकने के लिए कहा।

  ``पहले मुझे मेरी तनख्वाह दो,बाद में अंगूठा लगाऊँगी।’’

  ``क्या तुम साहूकार हो और सरकार चोर है? सरकारी नियमानुसार होगा। पहले अंगूठा कर दो,बाद में तनख्वाह मिलेगी।’’

  तब तो लो,यह अंगूठा। कहकर अंगूठा परसोत्तम को दिखाकर खेमी ने अंगूठा टेक दिया। परसोत्तम ने यह देखा भी पर उसके पास चिढाने का वक्त नहीं था। दोनों की तनख्वाह में से आधा आधा रूपया काटकर बाकी बचे साढ़े नौ रुपये जमीन पर रखे। मंगी ने अपने पैसे चुपचाप ले लिए। खेमी ने कहा:``मुझे पूरे रुपये दो तो लूंगी,अन्यथा नहीं लूँगी।’’

  ``नहीं लेने तो भले ही पड़े रहे जमीन पर।’’वह चलने को ही था कि खेमी ने लम्बा झाडू सामनेवाली दीवार पर टिकाकर उसका रास्ता रोका:``ऐसे कैसे जा सकते हो?’’

  ऐसे में अन्य जिले के हरिजन आये। परसोत्तम ने देखा कि खेमी के आगे चलेगी नहीं और दूसरे भंगियों के सामने वेआबरू होगा इस लिए बात को ख़त्म करने के लिए:’’लो,यह तुम्हारे पैसे,वह अठन्नी वापस करो।’’

  ‘‘पहले रूपया दो तो वापस लौटाऊँ।’’

  परसोत्तम ने रूपया नीचे फेंका तब खेमी ने झाड़ू हटाया और नीचे झुककर लेने लगी। परसोत्तम ने पुन: वह अठन्नी वापस मांगी।

  ``रुको तो,खनका लेने दो’’दूसरे की ओर देखती हुई वह रुपये खनखनाने लगी।

  परसोत्तम ने पुन: अठन्नी मंगी।

  ‘‘मुझे नहीं मिल रही’’ कहती हुई खेमी चलने लगी। परसोत्तम को नीचे झूककर धूल में से वह अठन्नी उठानी पड़ी।

  आज भंगियों के मन में खेमी के लिए साश्चर्य आदर अनुभव हुआ। उसने गीत शुरू किया और सारे हरिजन गाने लगे:

```ओरो आव्यने केशला,तारो ओशलो कूटुं।;
ओरो आव्यने केशला,तने पाटुए पीटूँ।
ओरो आव्यने केशला,तने धोकने धीबुं;
ओरो आव्यने केशला,तारे पुंछडे लिम्बु।’’



  राह चलते पथिक और स्टेशन से आ रहे मुसाफिर इस विचित्र गीत को सुनने के लिए खड़े रहते थे कि एक आवाज सुनाई पड़ी:

  `` अरी,खेमी तनिक यहाँ तो आ।’’

  खेमी ने तुरंत गाना रोक दिया और खड़ी हो गई। जिस गली से आवाज आई थी,उसकी ओर देखा और उस तरफ चल दी।

  उसकी सास उसे बुलाने के लिए आई थी।

+ + +



  धनिया और खेमी के पहले तीन दिन अकथ्य आनंद और खाने-पीने में गुजरे। चौथे दिन धनिया और खेमी बतियाने लगे। खेमी नडियाद में कैसे रहती थी? उसके गीत, उसकी अन्य हरिजनों के साथ होनेवाले विनोद आदि सुनकर धनिया ने कहा:``खेमी तुम बहुत सख्तदिल हो। मेरा यहाँ जी ही नहीं लग रहा था और तुम वहां मौज कर रही थी।’’

  ``मेरा भी जी नहीं लग रहा था पर जब तक तुम बुलाते नहीं तब तक मैं कैसे आ सकती हूँ?’’

  `` मैं तुम्हें कैसे बुलाता? मैं कुसूर कर बैठा और मेरे लिए तुम्हारे पास आना मुश्किल हो गया। माँ से कहता था पर उसका कहना था कि:`एकाध दिन में आ जाएगी। कितने दिन रहेगी? लेकिन तुम जो बहुत मानी ठहरी!

  ``भूल तुम्हारी थी तो तुम्हें मुझे बुलाना चाहिए ना!’’

  ‘‘पर भद्रकाली माता का प्रताप भारी।’’

  ``ऐसा क्यों?’’

  ``देखो, पहले रामदेपीर की मन्नत रखी पर तुम नहीं आई। बाद में हरखशामाता की मन्नत रखी,झांपडीमाँ की मन्नत रखी तब भी तुम नहीं आई। बाद में भद्रकाली माता की मन्नत मानी। घर गया तब मेरी माँ ने मुझे कहा कि,``अरे धनिया तुम तो बहुत सूखते जा रहे हो। चल तेरी दूसरी शादी करा देती हूँ। मैंने कहा:``मुझे किसी ओर से शादी नहीं करनी है। मेरे लिए तो यदि खेमी आती है तो हाँ नहीं तो ना। बाद में माँ तुझे लिवाने आई।’’

  ``मैंने भी कई मन्नतें मानी तब कहीं जाकर तुम्हारी माँ मुझे लिवाने आई।’’

  ``तुमने किसकी मन्नत रखी थी?’’

  ``मैंने रामदे पीर की मन्नत मानी, बाद में नडियाद में संतराम महाराज के लिए भोग की मन्नत मानी। बाद में महाकाली की यात्रा की मन्नत मानी।’’

  ``अरर, खेमी।’’ धनिया पर मानों वज्र गिरा।``तुमने गलत किया। तुम्हारी मन्नत के साथ रुपये हुए,मेरी मन्नत के पचास हुए। शादी के खर्च के ढाईसौ रुपये तो अभी देने बाकी हैं और वह पटेलवा

  रोजचक्कर काटता रहता है। ये सब मैं कब चुकता कर पाउँगा? और भद्रकाली तो साक्षात् हैं!।’’ किस देव की मन्नत से दोनों पुन: जुड़ सके हैं वह अनिर्णीत रहने के कारण सारी मन्नतें पूरी किये बिना कोई चारा नहीं था।

  ``अरे, उसमें क्या?चारसौ रुपये तो हम ऐसे ही भर देंगे। मेरे जेवर बेचकर जमा करा देना।’’खेमी ने धनिया को आश्वस्त किया।

  ``अरे,अभी तो पंच का जुरमाना भी जमा कराना है। यह तो मैंने तुम्हें बताया ही नहीं। ऊँची-नीची जातियोंवाले हमारे समाज में प्रत्येक ज्ञाति को अपने से कोई तो नीचा चाहिए ही होता है।

  अहमदाबाद के हरिजन काठियावाडी भंगियों को अपने से नीचा मानते थे। धनिया को शादी करते समय दोनों पंचों को जिमाना पड़ा था। खेमी चली गई तब काठियावाडी पंच की बैठक हुई। उस पंच ने अन्दर ही अन्दर मसलत की। बाद में अहमदाबाद के पंच से बातचीत की। तत्पश्चात अहमदाबाद के पंच की बैठक हुई। ऐसे में खेमी वापस लौट आई। अब जुर्माने की बात तो रही नहीं पर इतने दिन तक खाने-पीने का खर्च दोनों पंचों ने धनिया के माथे मढ दिया। हमारे समाज में जात-बिरादरी की रूढ़ियाँ और ज्ञाति के संकल्प कुदरती घटनाओं जैसे अनिवार्य और अप्रतिरोध्य माने जाते हैं।

  यह सब सुनकर खेमी हैबत खा गई। फिरभी उसने आश्वस्त किया। स्त्री जब पुरुष को पश्तहिम्मत होते हुए देखती है तब उसमें कोई खास हिम्मत का संचार हो जाता है। पर धनिया को आश्वासन फला नहीं। हताश होकर वह खेमी की गोद में सो गया। खेमी भी चिंताग्रसित होकर सो गई। तीन दिन का सुख भोगकर यह दम्पति पुन: दु:खी संसार में डूबा।

  दूसरे दिन खेमी ने जेवर निकालकर देते हुए कहा कि इसे बेच दे पर पत्नी को जेवर रहित देखने का विचार असह्य हो जाने के कारण बेचने के बजाय धनिया ने जेवर गिरवी रखकर पैसे उठाये। उसने यदि बेचे होते तो पर्याप्त राशि मिलती पर गिरवी रखने के कारण राशि कम हाथ लगी और आख़िरकार जेवर व्याज में गर्क हो गए। धनिया या खेमी किसी की समझ में यह बात आई नहीं। दोनों यथासंभव पैसे जोड़-जोड़कर जमा करने लगे। ऐसे में धनिया की माँ की मौत हो गई। उसका एकसौ रूपया खर्च हुआ। तीन माह बाद खेमी का प्रसवकाल आया। अत: उसकी कमाई भी बंद हो गई। प्रसव के दौरान धनिया का खेमी की ओर से आश्वासन बंद हुआ और चिंता-तनाव से छूटने के लिए दारू की ओर मुडा। खेमी जब प्रसवकाल से बाहर आई तब उसने देखा कि धनिया ने पुन: पीना शुरू कर दिया है। उसने धनिया को पुन: डांटा पर अब उसकी डांट में तिरस्कार नहीं था, दया भाव था। उसे लगता था कि धनिया की इस दशा के लिए वह खुद जिम्मेदार है। फिरभी एकबार मन को कडा करके उसे धमकाया। धनिया कुछ बोला नहीं लेकिन रात को घर वापस नहीं लौटा। खेमी उसे रिचीरोड़ के फुटपाथ पर से खोजकर घर ले गई। खेमी उसे समझाती थी पर उसके जवाब में धनिया मात्र आहें भरता था। अब खेमी का दिल मात्र द्रवित होता था। उसे सिख देने जितनी सख्ती नहीं रही थी।

  एक दिन जाड़े की रात में भारी सर्दियों में धनिया घर नहीं गया। खेमी अपनी दो वर्षीया बच्ची को रोती छोड़कर उसे खोजने के लिए निकली। दो घंटे की मेहनत के बाद उसने धनिया को रेती में पड़ा हुआ पाया। उसे जगाकर धीरे-धीरे अपने घर ले गई। दूसरे दिन से धनिया को न्युमोनिया हुआ। खेमी ने पुन: मन्नतें मानी,ओझा को बुलाया। उसने नयी मन्नतें मनवायीं पर धनिया पुनर्स्वस्थ नहीं हुआ। खेमी पर वैधव्य भार आ गया।

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  खेमी का सारा जीवन वैधव्य के शोक से छा गया था उसे और कुछ तो नहीं पर धनिया उसे मन्नतों की जिम्मेदारियों के साथ छोड़कर चला गया, उस बात का शोक ज्यादा अनुभव हो रहा था। उस वजह से उसे जीवनभर क्या क्या सहना पड़ेगा, इस बात को लेकर सशंकित रहा करती थी और कोई उपाय हाथ नहीं लग रहा था।

  एक दिन खेमी रिचिरोड़ पर झाडू-बुहार कर रही थी। अब वह कच्छा(कछौटा)नहीं बांधती थी। झाड़ू लगाते हुए वह धनिया की माँ का विचार करने लगी। उसने सामने चौकी पर माथे पर बड़ा त्रिपुंड रचाए बैठे ब्राह्मण को देखा। बीच में बड़ा तिलक किया हुआ था और नाक पर पतली सी काली आड़ की थी। माथे पर फटी हुई दक्षिणी पघडी रखी हुई थी। हाथ की कलाई में रुद्राक्ष की बड़ी माला और गले में रुद्राक्ष मालाएं पहनी थी। महाराज ने चौकी को झाड-बुहारकर उस पर आसन बिछाकर,सामने एक पाटी(स्लेट),पेन,हस्तरेखा दर्शक चित्रावली,पंचांग और उस पर रमल विद्या के मोहरे सजा रहे थे।खेमी उसके पास जाने लगी।उसे आती देखकर महाराज ने सनातन तिरस्कार भाव के साथ उसे दूर रहने के लिए कह।खेमी ने कहा:``महाराज,मुझे एक सवाल पूछना है।’’ ‘‘तो चार आने नीचे पायदान पर रख।’’ महाराज के लिए खेमी की छाया अपवित्र थी,उसके पैसे अपवित्र नहीं थे। खेमी ने चवन्नी सोपान पर रखी। महाराज ने पानी छिड़ककर चवन्नी ले ली। बाद में कहा:``अब पूछ।’’

  ‘‘महाराज! किसी का पति मन्नतें पूरी किये बिना मर गया हो और उसकी पत्नी मन्नत पूरी करे तो उसे वह पहुंचेगी या नहीं?’’ठीक से देखकर बताना,महाराज।’’ उंगली के गांठें गिनकर महाराज ने कहा:``हाँ।’’

  ``ठीक है, महाराज!’’ कहकर खेमी जाने को थी कि महाराज ने वापस बुलाकर कहा कि यदि वह अविधिपूर्ण विवाह कर ले तो नहीं पहुंचेगी। खेमी पैर छूकर चली गई।

  खेमी ने अब मन्नतें पूरी करने के लिए पैसे जोड़ना शुरू कर दिया। खेमी की काया टूट गई थी पर उसका सौन्दर्य अभी भी कम नहीं हुआ था। अनेक भंगियों ने उससे पुनर्विवाह के प्रस्ताव भेजे। उसने सबको एक ही जवाब दिया कि धनिया की मन्नतें पूरी किये बगैर वह पुनर्विवाह नहीं कर सकती। एक हरिजन ने मन्नत के लिए नगद पैसे देने के लिए कहा पर खेमी ने अपनी कमाई से ही मन्नतें पूरी करने का निश्चय बताया।

  वह सात साल में धनिया की मन्नतें पूरी कर सकी। एक हरिजन ने पुन: उसे घर कर लेने के लिए कहलवाया। उसने जवाब दिया कि :`` ना,इतने बरसों के बाद मुझे अपनी जिंदगी रूपी वस्त्र पर पैबंद नहीं लगवाना है!’’

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