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वर्ष: 1, अंक 7, जनवरी, 2017



रोटी


शबनम शर्मा


हम बहुत छोटे थे। खेलने के लिये अकसर घर से बाहर निकल जाते। उन दिनों कोई टी.वी., विडियो गेम या फिर दूसरा साधन न था। इतवार का दिन था। सामने वाले के झार में काम लगा हुआ था। मिट्टी, रेत के बड़े-बड़े ढेर थे। हम बच्चे वहीं खेलने लगे। काफी देर खेलने के बाद हम आम के पेड़ के नीचे बैठने को आये। वहाँ पर एक मज़दूर हाथ में रोटी का डिब्बा लिये आ गया व हमें वहाँ से जाने को कहने लगा।

हम शोर न मचा रहे थे न ही शरारत कर रहे थे फिर भी उसे अखर रहे थे। हम वहाँ से हट गये। सामने वाली दिवार के पीछे छिप गये। उसने चहुँ ओर देखा व अपनी रोटी का डिब्बा खोला। बोतल से पानी इक डिब्बे में डाला और उसमें नमक मिर्च मिलाया व रोटियाँ तोड़कर डाल दी। रोटियाँ गीली और नरम हो गई व खाने लगा। रोटी खत्म कर खुद ही बड़बड़ाया, ‘‘बच्चों को क्या पता रोटी की कीमत, ये तो आधी खाने वाले व आधी फेंकने वालों में हैं, डर जाते मुझे पानी संग रोटी खाते देखकर।’’ उनकी ये बात याद आते ही कई बार मेरा मन सिहर जाता है।

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