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वर्ष: 1, अंक 7, जनवरी, 2017



प्यास


शबनम शर्मा


बात उन दिनों की है जब मंडल कमीशन का काफी शोर था। जगह-जगह बंद चल रहे थे। इस बीच मुझे लखनऊ जाना पड़ गया। ज़रूरी काम था। मैं सामान समेट कर चल पड़ी। मेरे साथ मेरा 4 बरस का बेटा भी था। हम देहरादून से रवाना हुए। ट्रेन रात को साढ़े आठ बजे के करीब चली। मन में एक अजीब सा डर बैठा था। 2-3 जगह ट्रेन रुकी। गंतव्य तक पहुँचने में काफ़ी लेट हो गई। मेरा बच्चा बार-बार कुछ खाने या पीने को माँग रहा था। मैंने जो कुछ सामान रखा था लगभग खत्म हो गया था। रास्ते में कोई ट्रेन में कुछ बेचने भी न आ रहा था। उसे ज़ोर की प्यास लगी, वो रोने लगा। मेरे पास रखा पानी भी खत्म हो गया था। मैं उसे सांत्वना दे रही थी, अभी लखनऊ आने वाला है, ठंडा पानी भी आएगा। पर उसकी प्यास गरमी की वजह से काफी बढ़ गई थी। मेरे सामने एक बुजुर्ग बैठे थे उन्होंने अपने झोले से (थैले से) एक पानी की बोतल निकाली व बोले, ‘‘बेटी मैं बहुत देर से इस बच्चे को परेशान होते देख रहा हूँ, मेरे पास पानी है पर मैं मुसलमान हूँ, बता रहा हूँ कहीं आप वहम करें, आप चाहें तो पानी पिला सकती हैं।’’ मेरे से पहले मेरा बेटा बोतल पर झपट पड़ा, उसने गट-गट पानी पिया। मेरी आँखों से आँसू निकल पड़े। मैंने कहा, ‘‘चाचा कभी पानी भी हिन्दू या मुसलमान होता है। आपने ऐसा क्यूँ सोचा? ये तो सिर्फ प्यास बुझाता है। शुक्रिया चाचा, बहुत-बहुत शुक्रिया।’’

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