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वर्ष: 1, अंक 7, जनवरी, 2017



दिन हौसला


शबनम शर्मा


सुबह का वक्त था। जनवरी का महिना। लखनऊ की ठंड। मैं छत पर जाकर बैठ गई। मन बहुत उदास था। मेरी बेटी मात्र 8 महिने की थी और बेटा 12 साल का। मेरे पति को फौज से रिटायरमेंट मिल गई थी। रोटी के लाले पड़ गये थे। कभी अपनी गोद में आई बेटी को देखती तो कभी मझधार में खड़े बेटे को। पति की मायूसी भी मुझसे देखी न जा रही थी। आगे के समय को सोच-सोचकर मन बैठा जा रहा था। मेरी उम्र मात्र 32 बरस की थी। अब क्या करेंगे? कैसे काटेंगे आगे का समय? यही सोचकर आँखों से आँसू सूख नहीं रहे थे। अपना मकान भी न था जहाँ सिर छुपा सकें।

मेरा शरीर और मन दोनों ही परेशान थे कि बाजू वाली अम्मा जी भी छत पर कपड़े सुखाने आ गईं। उन्हें मेरी पूरी परिस्थिति के बारे में खबर थी। वो मेरे पास आकर बैठ गईं और बोली, ‘‘बेटी, सोचने या रोने से कभी कोई काम नहीं होता। इसके लिये हमें सही दिशा ढूंढनी होगी। तू तो पढ़ी-लिखी है कुछ भी कर सकती है। जब मेरे पति मुझे छोड़ कर गये तो मेरे 5 बच्चे, बूढ़ी सास-ससुर और मैं। कैसा-कैसा समय निकाला, लोगों के स्वैटर बुने, बर्तन मांजे, घर लीपे, फिर समय मिलता तो दरियाँ बुनती। आज मेरे बच्चे बड़े हो गये हैं, मैं आराम से हूँ। बेटी, वक्त कभी एक सा नहीं रहता और सुन अच्छा है ये वक्त जवानी में आया, बुढ़ापा सुखी होगा। आँसू पोंछ और सोच करना क्या है?’’ उनकी इस बात ने मेरी सोच, ज़िन्दगी ही बदल दी।

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