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वर्ष: 1, अंक 7, जनवरी, 2017



कीमत


चंद्रेश छतलानी


दिन उगते ही अखबार वाला हमेशा की तरह अखबार फैंक कर चला गया| देखते ही लॉन में बैठे घर के मालिक ने अपने हाथ की किताब को टेबल पर रखा और अख़बार उठा कर पढने लगा, चाय का स्वाद अख़बार के समाचारों के साथ अधिक स्वादिष्ट लग रहा था| लम्बे-चौड़े अख़बार ने गर्व भरी मुस्कान के साथ छोटी सी किताब को देखा, किताब ने चुपचाप आँखें झुका लीं|

घर के मालिक ने अख़बार पढ़ कर वहीँ रख दिया, इतने में अंदर से घर की मालकिन आयी और अखबार को पढने लगी, उसने किताब की तरफ देखा भी नहीं| अखबार घर वालों का ऐसा व्यवहार देखकर फूल कर कुप्पा नहीं समा रहा था| हवा से हल्की धूल किताब पर गिरती जा रही थी|

घर की मालकिन के बाद घर के बेटे और उसकी पत्नी ने भी अख़बार को पढ़ा| शाम तक अखबार लगभग घर के हर प्राणी के हाथ से गुज़रते हुए स्वयं को सफल और उपेक्षित किताब को असफल मान रहा था|

किताब चुपचाप थी कि घर का मालिक आया और किताब से धूल झाड़ कर उसे निर्धारित स्थान पर रख ही रहा था कि किताब को पास ही में से कुछ खाने की खुशबू आई जो उसी अख़बार के एक पृष्ठ में लपेटे हुए थी और घर का सबसे छोटा बच्चा अख़बार के दूसरे पृष्ठ को फैंक कर कह रहा था, "दादाजी, इससे बनी नाव तो पानी में तैरती ही नहीं - डूब जाती है|"

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