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वर्ष: 1, अंक 7, जनवरी, 2017



सिर्फ चाय


चंद्रेश छतलानी


"सवेरे गुड़िया के कारण देर हो गयी, बेटा होता तो तैयार होने में इतना समय थोड़े ही लगाता| दिन में भी इसी परेशानी से काम में गड़बड़ हो गयी और बॉस की बातें सुननी पड़ी, पूरे दिन में सिर्फ तीन बार चाय पी है, खाना खाने का भी समय नहीं मिला| अब ठंड इतनी हो रही है और गर्म टोपी और दस्ताने भी भूल गया|" सर्द सांझ में थरथराते हुए अपनी इन सोचों में गुम वो जा रहा था कि अनदेखी के कारण अचानक उसकी मोटरसाइकिल एक छोटे से गड्डे में जाकर उछल गयी, और वो गिर पड़ा| हालाँकि ना तो मोटरसाइकिल और ना ही उसे चोट आयी, लेकिन उसके क्रोध में वृद्धि होना स्वाभाविक ही था|

घर पहुँचते ही उसने गाड़ी पटक कर रखी, आँखें गुस्से में लाल हो रहीं थी| घंटी भी अपेक्षाकृत अधिक बार बजाई| दरवाज़ा उसकी बेटी ने खोला, देखते ही उसका चेहरा तमतमा उठा|

लेकिन अपने पिता को देख कर बेटी उछल पड़ी और उसके गले लग कर कहा, "डैडी, आज मैनें चाय बनाना सीख ली| आप बैठो, मैं सबसे पहले आपको ही चाय पिलाऊंगी|"

और अचानक से उसके नथुने चाय की गंध से महकने लगे|

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