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वर्ष: 1, अंक 7, जनवरी, 2017



फिर कैसा नव वर्ष...

विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र'


आज जब रात्रि को घड़ी की सूंई ने बारह के अंक को क्या छुआ ? मानों पटाखों में मच गई, फटने की होड़ डी जे की तीक्ष्ण ध्वनि पर, थिरकने लगे लोग छलके जाम रात हुई बेलगाम अचानक,इतनी खुशी ! मैं सहम गया मानो,मेरे देश ने फतह किया हो, कोई अजेय किला | मंहगाई ने जब , तोड़ रखी हो कमर आम जन की आतंकवाद ने छीन रखी हो, शान्ती मन की कैंसर जब बन गया हो, भ्रष्टाचार नक्सलवाद का कॉटा लगा हो पैर में,तो कर विचार... फिर कैसा हर्ष ? कैसा नव वर्ष ?? गिरावट में कहाँ ,ढूँढ़ता उत्कर्ष ??? अरे ओ भोले प्राणी तन्द्रा त्याग, साल के बदलने से, दशा नहीं बदलती दशा बदलती है, स्वयं के बदलने से,व्यवस्था के बदलने से, झूठी तसल्ली के लिए, कबतक 'बदलता रहेगा पंचांग और भटकता रहेगा,इस जंगल में, मृग बन...कस्तूरी की तलाश में...
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