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वर्ष: 1, अंक 7, जनवरी, 2017



तब और अब

डॉ.रजनीकान्त शांतिलाल शाह


कुछ बरसों पहले घीसू और माधव मरी हुई बुधिया के कफन के लिए थे निश्चिंत कुछ महीनों पूर्व दाना मांझी पत्नी का शव लेकर आए। मृतकों की बात लिए दोनों आए। कान में कहूँ –इस तथाकथित सभ्य समाज की बात लिये आये सभ्य समाज की बेशर्मी लिये। घीसू के साथ उसका बेटा था माधव और दाना के साथ थी उसकी भूखी और डरी-सहमी सी छोटी बेटी दोनों तड़प रहे थे। माधव तड़प रहा था शराब और तली हुई मछली के लिए और दाना पुत्री रो रही थी पिता की अवशता को लेकर तब और अब में फर्क यह था कि तब सभ्य समाज दवाई नहीं कफन के लिये उदार था। और अब तो कंधा देने के लिये नहीं, पर इस शर्मनाक घटना की तस्वीरें खींचने और सोशयल मीडिया पर वाइरल करने हेतु। भरी जेबें उनकी खाली थी मृतक के लिये, भूखे दाना और उसकी पुत्री के लिये छोड़ो दाना और उसकी बेटी की भूख को, निजी या सरकारी शवगाड़ी दिलाने तक के लिये भी। घीसू,माधव, बुधिया और दाना परिवार थे शहर में क्योंकि घिसू, माधव थे दूर गाँव के और दाना माझी भी साठ किलोमीटर दूर गाँव के। तब और अब दोनों लाचार थे। एक कफन के लिये तो दूसरा घर की दूरी तय करने के लिये। परिवार एक रो रहा था कफन के लिये। और दूसरा अश्रुरिक्त आँखों में शहरी सभ्यता का कुतूहल लिये कि अब दाना क्या करेगा? क्योंकि शहरियों को तो कुछ करना नहीं था। घीसू और माधव तो आश्वस्त थे कफन को लेकर क्या तब की महाजनी सभ्यता में शेष रह गई थी शर्म थोड़ी सी? या फिर उसे पाप और पुण्य का भय था। और अब के सभ्य समाज ने सवस्त्र नग्नता की छड़ी ऐसी पुकारी थी कि कोई नहीं आगे आया दाना को सहारा देने इसी लिये तो घीसू कहता है दाना से- दानाभाई अब कोई नहीं आएगा मदद में तुम्हारी क्योंकि उनका जो था वह सब तो खर्च हो चुका मुझे दो बार कफन दिलाने में। और इनका मोबाइल केमेरा खरीदने और तुम्हारी फोटो वाइरल करने में। तुम तो दाना नहीं सिर्फ नाम के तुम दाना हो इस खस्ता हाल में मरी पत्नी और भूखी और अवश बेटी का जिम्मा उठाने में तुम अकेले चले चलो दु:ख तुम्हारा है,उठाना भी तुम्हें ही है। लाचार हो तुम पर हतवीर्य नहीं हो तुम कंधा तुम्हारा मजबूत है और पैरों में अभी ज़ोर है खून में अभी गर्मी है तुम्हारे शेष सब का तो खून है ठंडा पड़ा। समाज वही है,लोग वही है पर वक्त है बदला हुआ, बदली हुई नियत लिये हुए।
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