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वर्ष: 1, अंक 7, जनवरी, 2017



रोटियां

प्रिया देवांगन


गोल गोल जब घर में, बनती हैं रोटियां खाकर मन तृप्त हो जाती है रोटियां।
आते ही घर में, पानी देती है बेटियाँ गरम गरम तुरंत, खिलाती हैं रोटियां ।
चंदा सा गोल , जब बनती हैं रोटियां नया नया सपना, दिखाती हैं रोटियां ।
मेहनत कर कमाई से,जब खाते हैं रोटियां दिल में सुकून और शांति, दे जाती हैं रोटियां ।
मां अपनी हाथों से,जब बनाती हैं रोटियां दो कौर और ज्यादा, खिलाती हैं रोटियां ।
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