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वर्ष: 1, अंक 7, जनवरी, 2017



पुनरावृत्ति

प्रताप सिंह


जीवन भर हम पुनरावृत्ति करते हैं शब्दों की, भावनाओं की, क्रियाओं की, और गढ़ते हैं नई बातें...नई कविताएँ, नए आकर्षण...नए रिश्ते, नए संसाधन...नए प्रयोजन, निरंतर...पूरे उत्साह से. ऐसा नहीं कि पुनरावृत्ति नीरस और उबाऊ नहीं होती... ..................होती है... किन्तु, तब तक नहीं जब तक उससे नवीनता जनमती है.
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