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वर्ष: 1, अंक 7, जनवरी, 2017



बंशी की टेर उठे

प्रताप सिंह


बंशी की टेर उठे नदिया के तीर मन में जगाए अनजानी सी पीर बंशी की टेर उठे नदिया के तीर नावों के पाल फटे हहराती लहर उठे आज हैं हवाएँ क्यों इतनी अधीर बंशी की टेर उठे नदिया के तीर बदरी ने चाँद हरा मनवा में स्याह भरा आँखें चकोर की बरसाएँ नीर बंशी की टेर उठे नदिया के तीर ररुही ने राग भरे असगुन ने पाँव धरे विरहन की आह उठे जियरा को चीर बंशी की टेर उठे नदिया के तीर
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