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वर्ष: 1, अंक 7, जनवरी, 2017



कहाँ गई वो तुतली बोली

- जयश्री जाजू


आज सोचती माँ बैठी -बैठी, खुली आँखों से देख रही थी, छोटी-सी मुस्कान थी प्यारी, देख उसे माँ खुश होती थी | वो उसकी मीठी प्यारी बोली, मानो घुल गई कान में मिश्री, कुछ समझी कुछ ना समझी, फिर भी सुनने को ललचाता जी | तरस रहा है मेरा जी, कहाँ खो गई वो बोली, फिर कानों में घुले मिश्री , सुनकर जिसको मैं खिली |
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