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वर्ष: 1, अंक 7, जनवरी, 2017



बेटी वाली माँ

- गुर्रमकोंडा नीरजा


माँ ! नन्हे से इस अवांछित प्राण को खाद-पानी देकर प्यार से पोसा तुमने आंधी-तूफ़ान से बचाया समेटकर अपने गर्भ में. हर वक्त बातें करती रहीं मुझे आश्वासन देती रहीं अपने आप को समझाती रहीं जिंदगी से लड़ती रहीं; दुनिया से भी तो! छिप-छिप आँसू बहाती ममता की मूर्ति तुम बचाती रहीं मुझे हर वार से, दिलाती रहीं विश्वास – ‘तुम अवांछित नहीं हो, मेरी बेटी!’ तुमने मुझे जीवन दिया, दुनिया दी. आगाह किया बार-बार कदम-कदम खतरों से. रक्षा-कवच बन गईं तुमहर बार. सारे रिश्ते तुमसे रूठ गए मेरे कारण पर तुम मेरा हाथ थामकर खड़ी रहीं, मेरी खुशियों में अपनी खुशी दूंढतीं मेरी जिंदगी को अपनी बनाकर आगे बढ़तीं, ओ मेरी माँ ! आज तक काट रही हो तुम बेटी जनने की सज़ा बिना उफ़ किए. पर मैं कराहती हूँ कभी जब दर्द से मुझे अपने गोद में लेकर सींच देती हो आंसुओं से मेरा माथा. आँखों-आँखों में देती हो नसीहत – ‘बेटी की माँ हो, कमज़ोर मत पड़ना!’
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