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वर्ष: 1, अंक 7, जनवरी, 2017



देखो फिर पीपनी बजने लगी है

- दिनेश ध्यानी


देखो फिर पीपनी बजने लगी है अफजल प्रेमी गैंग की बारात सजने लगी है वतन से अधिक वोट प्यारे हैं जिनको उन पिशाचों की महफिलें सजने लगी हैं देखो फिर पीपनी बजने लगी है। न सीमा पे लडते सिपाही की चिन्ता न शहीदों की शहादत की फिकर है फिकर है तो बस देशद्रोही मरे क्यों? तुष्टीकरण की दुकानें सजने लगीं है देखो फिर पीपनी बजने लगी है। असहिष्णुता का राग कभी ये आलापें कभी छद्म धर्मनिरपेक्षता सुर बघारें सदा वोट की शाजिसों में हैं रहते परत दर परत अब कलई खुलने लगी है देखो फिर पीपनी बजने लगी है। कुछ बुद्धिजीवी, ढोंगी सियारों के रंग हैं सम्मान लौटाने वाले दलालों के ढंग हैं खालिस इन्हें स्वार्थ ही स्वार्थ दिखता जनता ढोग गिरगिटों का समझने लगी है देखो फिर पीपनी बजने लगी है। जेलर की हत्या कहो कैसे कर दी? नही प्रश्न कैराना का ये उठाते कश्मीर की लाखों पडिंत कहां है? मुज्जफर नगर पे दिन रात आंसू बहाते वोटों की चिन्ता अखरने लगी है देखो फिर पीपनी बजने लगी है। मरे कोई आतंकी मातम मनाते आधी रात कानून के दर पे जाते बंग्ला देश में रोज जो मर रहे हैं पाकिस्तान में रोज ही कट रहे हैं देश में भी तो हालात कमतर नहीं हैं बंगाल में रोज घर जल रहे हैं उनका नही कोई खैरख्वाह जग में? सोचकर भौंहें अब खुद तनने लगी हैं देखो फिर पीपनी बजने लगी है। कभी धर्म के नाम पर दंगे कराते कभी जाति के नाम हैं लडाते जहां भी कहीं वोट बैंक दिख है जाता वहीं भेडियों की चिल्लम पौं होने लगी है देखो फिर पीपनी बजने लगी है। देश से बढ़कर सत्ता है प्यारी शाजिस करे रोज वोट की तैयारी सत्ता सलामत रहे देश की क्या सत्ता के लिए विसातें बिछने लगी हैं देखो फिर पीपनी बजने लगी है।
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