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वर्ष: 1, अंक 7, जनवरी, 2017



दो ही बातें

डॉ०अनिल चड्डा


दो ही बातें तो हो सकती हैं - या तो हम बुरे हो सकते हैं , या अच्छे हो सकते हैं, बीच की तो कोई बात नहीं । दो ही बातें तो हो सकती हैं - या तो जीवन हो सकता है, या फिर मृत्यु, बीच की तो कोई बात नहीं । दो ही बातें तो हो सकती हैं- या तो हम ईमानदार हैं, या फिर बेईमान, बीच की तो कोई बात नहीं । दो ही बातें तो हो सकती हैं- या तो हम अहंकारी हैं, या फिर विनम्र, बीच की तो कोई बात नहीं । दो ही बातें तो हो सकती हैं – या तो हम स्वार्थी हैं, या फिर निस्वार्थी, बीच की तो कोई बात नहीं । दो ही बातें तो हो सकती हैं- या तो हम नास्तिक हैं, या फिर आस्तिक, बीच की तो कोई बात नहीं । दो ही बातें तो हो सकती हैं- या तो विश्वास होता है, या फिर नहीं होता, बीच की तो कोई बात नहीं । प्यार की भी तो, दो ही बातें हो सकती हैं – या तो हो सकता है, या नहीं होता । प्यार होने पर, दो ही बातें तो हो सकती हैं – या तो मिलन हो सकता है, या फिर बिछड़ जाते हैं । पर अगर बिछड़ गये तो याद तो आती ही है, चाहे कोई तुम्हे प्यार करे या न करे, चाहे तुम्हे कोई याद करे या न करे,
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