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वर्ष: 1, अंक 7, जनवरी, 2017



अंतिम पड़ाव की बात

डॉ०अनिल चड्डा


आओ आज हम अंतिम पड़ाव की बात कर लें, जिंदगी तो यूं ही बीतती चली जायेगी और हम उलझे रहेंगे, जिंदगी की अनसुलझी पहेलियों में सोच-सोच कर कि न जाने कल क्या होगा, सोच-सोच कर अगर ऐसा होता तो वैसा होता अगर मैं यूं न करता तो यूं न होता इन सब बातों के लिए जिंदगी बहुत छोटी है या यूं कहिये कि इन बातों के लिए बहुत जिंदगी पड़ी है अगर हम आखिरी पड़ाव पर न पहुचे तो जिस पर हम कभी भी पहुँच सकते हैं यकायक ही फिर इन सब उलझनों में क्यों पड़ना आखिरी पड़ाव के बाद तो अनंत शान्ति है इसलिए आओ हम शांति की बात करते हैं! हम आखिरी पड़ाव की बात करते हैं!!
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