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वर्ष: 1, अंक 7, जनवरी, 2017



बलतोड़

अमरेन्द्र सुमन


अभी तक इस संबंध में मेरी राय यही थी यह कोई नासूर जख्म नहीं थोड़े समय की पीड़ा हो सकती है उन धैर्यहीनों के लिये वेवजह सारा घर जो सर पर उठा लेते हैं इस घाव से परेषान लोगों की कायरता पर हॅंसी ही आती सभी कहते खुद पर बीतती है तो समझ में आती है बात बलतोड़ ने दो-चार रोज से परेषान कर रखा है मुझे उठना-बैठना,चलना-फिरना यहाँ तक कि शौच में भी महसूसता हूँ जख्म की टीस जख्म कोई भी हो प्रभावित कर जाता है शरीर का एक-एक अंग समझ लो! पूरे दिन भर की चंचलता के लिये एक अभिषाप से कम नहीं
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