Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 1, अंक 7, जनवरी, 2017



ज़िन्दगी में कभी कोई काम ना आया

अमिताभ विक्रम


ज़िन्दगी में कभी कोई काम ना आया, सोचा पर जेहन में कोई नाम ना आया। दोस्ती के नाम की यूं तो बड़ी शुमारी थी, फिर किसी के लिए क्यों एहतराम ना आया। प्यार करने वाले बहुत थे इस ज़माने में, साथ निभाने एक भी इंसान ना आया। जब दिल टूटा तो आँखें नम थी, कोई मुकम्मल इल्म काम ना आया। भीड़ में जब था तो मैं गुम था, तनहा रहा तब रूह को कुछ सुकून आया।
www.000webhost.com

कृपया अपनी प्रतिक्रिया sahityasudha2016@gmail.com पर भेजें