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वर्ष: 1, अंक 7, दिसम्बर, 2017



टॉमी की दुम


- मिर्ज़ा हफ़ीज़


“यहीं आजा …” मित्र ने फ़ोन पर कहा “फ़ार्महाऊस पे हूं । यहां का हिसाब किताब निपटा रहा हूं । यहीं बैठकर बात कर लेंगे ।“

“ठीक है …” मैने कहा और उसके फ़ार्महाऊस पर पहुंच गया ।

मित्र सामने बरामदे मे ही बैठे हिसाब किताब मे मग्न थे । सामने एक विदेशी नस्ल का शानदार कुत्ता बैठा था, जो मुझे देखते ही खड़ा हो गया । मैने देखा, उसकी दुम नदारत थी । मै समझ गया ; इसके दुम दबाने या दुम हिलाने का कोई विकल्प ही नहीं है । तसल्ली इतनी सी थी कि, वह मित्र के सामने वाले टेबल से लोहे की सांकल से बंधा था । मित्र मेरी दुविधा को समझ गया । बोला “अरे ! चले आओ, चले आओ… कुछ नहीं करेगा ।“

मै डरते डरते बाज़ू वाली खाली कुर्सी पर बैठ गया । ‘कहाँ फ़स गया…’ मैं मन ही मन सोंच रहा था । मित्र बड़े गर्व के साथ अपने कुत्ते की गर्दन और पीठ पर हाथ फ़ेर रहा था ।

“क्या नाम है… ?” मैने उसके गर्व को भांपते हुये कुत्ते के विषय से ही चर्चा शुरू की ।

“टॉमी ।“ उसने बताया ।

“बड़ा शानदार है ।“ मैने बात आगे बढ़ाने की कोशिश की ।

“फ़ॉरेन की ब्रीड है ।“ उसने बात ज़ारी रखते हुये कहा “इम्पोर्ट किया है ।“

“अच्छा ! फ़िर तो बड़ा महंगा होगा ।“ मैने पूछा ।

“हां ! रखने मे भी बड़ा खर्च आता है ।“ गर्व से बताया ।

“अच्छा ! कितना खर्च आ जाता होगा ?” मैने यूं जताया जैसे मै भी एक रखना चाहता हूं ।

वह मुस्कुरा दिया । बड़ा व्यंग था उस तिरछी मुस्कान मे ।

“यही कोई पच्चीस से तीस हज़ार…” प्रश्नवाचक नज़रों को मेरे चेहरे पे गड़ाते हुये उसने जवाब दिया । जवाब क्या वह तो सवाल ही था । पर मैं भी कहां हार मानने वाला था । मैने भी प्रश्न कर दिया

“क्या खाता है ?”

“एक देड़ किलो तो मटन ही खा जाता है । फ़िर डॉग फ़ूड वगैरह …“

“और क्या क्या खर्चे हैं जनाब के ?”

“अरे मत पूछ यार ! रोज़ नहलाने के लिये सबुन शैम्पू वगैरह ।“

“इतना सब कौन करता है यार ?”

“एक लड़का रखा हूं न, रोज़ नहलाना धुलाना, घुमाने लेजाना, पोटि कराना, पोटि फ़ेंकना सब वही करता है ।“

“कितना लेता है ?”

“पूछ मत यार, इतने से काम के पांच हज़ार लेता है, स्साला । क्या करें भाव बढ़े हुये हैं इनके…, अरे ! अच्छा याद दिलाया …” कहते हुये उसने नौकर को आवाज़ लगाई- “रघू … ।“

एक लड़का भागता भागता अया और बड़े अदब से सिर झुकाय खड़ा होगया । उसके होठों से बस इतना ही फ़ूटा “जी मालिक ?”

उसकी मुखमुद्रा देख मैं सोंचने लगा, अगर इसकी दुम होती तो ज़रूर अभी वह दुम हिला रहा होता ।

“तेरा इस महिने का हिसाब रखा है, उठा ले ।“सामने टेबल पर पड़े पैसों की तरफ़ इशारा करते हुये मेरे मित्र ने कहा “और सुन ! इस महिने तूने दो दिन छुट्टी मारा है, एक ही दिन का पैसा काटा हूं । अगली बार छुट्टी मारा तो पूरा काट लूंगा ।“

उसने झट पैसे उठा लिये और अगली आज्ञा का इन्तेज़ार करने लगा । उसकी देह्मुद्रा बता रही थी कि यदि वह कुत्ता होता तो पक्का मेरे मित्र के पैर चाट रहा होता । मुझ लगा फ़ैज़ साहब ने शायद इसी के लिये लिखा होगा- ‘ये मज़लूम मखलूक गर सर उठाये तो इन्सान सब सरकशी भूल जाये’ लेकिन अफ़सोस ! वह बेचारा फ़ैज़ साहब से बिल्कुल नावाकिफ़ था ।

“अच्छा सुन …” मित्र ने अगला आदेश जारी किया “टॉमी को लेजा । हां ! और देख फ़्रिज मे से दो बोतलें निकाल ला, और गिलास और कुछ खाने का सामान भेज दे ।“

“जी…” कहकर उसने टॉमी को खोला और साथ लिये चल दिया । मै उसे जाता हुआ देख रहा था टॉमी और रघू साथ साथ जारहे थे, लेकिन दोनो की चाल मे काफ़ी असमानता थी । टॉमी की चाल मे राजसी ठाठ साफ़ नज़र आता था, नौकर रघु की चाल एक दबे सहमे गुलाम की चाल थी नज़रें ज़मीन पर, झुके हुये कंधे और गर्दन अदब से झुकी हुई ।

मुझे लगा टॉमी की दुम, रघू को लग गई है ।

“यार ! टॉमी तो इस रघु का नाम होना चहिये था ?” मैने कहा ।

“तुम मेरे टॉमी की इन्सल्ट कर रहे हो…” मित्र ने आंखें तरेरते हुये कहा ।

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