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वर्ष: 1, अंक 7, जनवरी, 2017



दिन बदले-बदले लगे हैं...

- विश्वम्बर व्यग्र


दिन बदले-बदले लगे हैं | ना रही वो सुबह की बेला भीड़ में भी मैं अकेला उगता सूरज बरसाये अग्नि,तोप का गोला लगे है दिन बदले-बदले लगे हैं | साँझ अब ना है सुहानी कुम्हला गई है रातरानी देख धरती की दशा अब,चाँद भी फीका लगे है दिन बदले-बदले लगे हैं | सत्-असत में फ़र्क ना अब सूख चले सब अर्क ना अब स्वार्थ ने फैलाई चादर,रिश्ते सब बोझा लगे हैं दिन बदले-बदले लगे हैं | कहाँ गये सावन के झूले फाग की हम फगुनाई भूले क्या बतायें दशा ऐसी,ना सोये ना हम जगे हैं दिन बदले-बदले लगे है |
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