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वर्ष: 1, अंक 7, जनवरी, 2017



गज़ल -
क्यों छूट गया मुझसे मेरा काफिला


डॉ०अनिल चड्डा


क्यों छूट गया मुझसे मेरा काफिला, मिटता नहीं अब दिलों का फासला । कोशिशें तो की मुस्कराने की लेकिन, कर न पाये हम ग़मों से मुकाबला । रफ्ता-रफ्ता प्यार भी हो ही जायेगा, न हो रिश्तों में तू इतना उतावला । वही राहें, वही फिजायें, वही हवायें, शायद फिर शुरू हो वही सिलसिला । ‘अनिल’ तू बेमौत ही मारा जायेगा, आग से खेलने को न यूँ तिलमिला ।
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