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वर्ष: 1, अंक 7, जनवरी, 2017



ग़ज़ल -
"जमाना भूल न पाए...."


अनन्त आलोक


जमाना भूल न पाए फ़साना हो तो ऐसा हो | मुहब्बत में हुआ रांझा दीवाना हो तो ऐसा हो || ** नशे में लड़खड़ा कर गिर पड़ें हम एक दूजे पर | सुरुरे इश्क में पीना पिलाना हो तो ऐसा हो || ** जरुरत क्या है तकिये की जमीं पर शब गुजर जाये | तुम्हारे पट मेरा सर हो सिराना हो तो ऐसा हो || ** गिरे गश खा उठे फिर तो फिरे पीछे तुम्हारे ही | शिकारे इश्क में नजरो निशाना हो तो ऐसा हो || ** न कोई पाठशाला है मुहब्बत की करो ट्यूशन | किताबे इश्क में पढ़ना पढ़ाना हो तो ऐसा हो || ** नहा आलोक मल मल तू मगर गंगा नहाने से | सभी गम पाप कट जाएनहाना हो तो ऐसा हो ||
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