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वर्ष: 1, अंक 7, जनवरी, 2017



ग़ज़ल -
"आँख में शोले दिल में अगन चाहिए!"


अनन्त आलोक


आँख में शोले दिल में अगन चाहिए ! सर पे होना बंधा क्यों कफ़न चाहिए ? ** कर चले हैं जो धोखा उन्हें पूछ लो | तुम को धन चाहिए या वतन चाहिए ? ** अब न छूना मेरे ताज कश्मीर को | गर सलामत तुम्हें जानो तन चाहिए ? ** कौन कहता है मुश्किल है मंजिल यहाँ | काम करने का जज्बा लगन चाहिए | ** हो गए हैं जो कैदे मुहब्बत उन्हें | नाम अपने जमीं औ गगन चाहिए | ** जो दिखाए सभी पर्वतो घाटियाँ | मुझ को ऐसा कोई पैरहन चाहिए | फैसला कर लिया है ये आलोक ने | आप जैसा ही मुझ को सनम चाहिए |
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