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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 100, जनवरी(प्रथम), 2021

रात आए तो..

सुरेंद्र सैनी बवानीवाल "उड़ता"

कितना इंतज़ार किया मिलन की रात आए तो आँगन बजे शहनाइयाँ शगुन की रात आए तो कितना अरसा हो गया दिले-हसरत दबी सी है मैं भी देखूं चाँद अपना सनम की रात आए तो आधी ज़िन्दगी गुजर गयी यूँ ही बेतरतीब जैसी तुम आओ तो लगे नए जनम की रात आए तो हर गुल खिलने लगे , हर क्यारी महकने लगे भवरों का मन लगे उस चमन की रात आए तो हमें अच्छा नहीं लगता ऐसी दूरियों के प्रेम से तुम भी तड़पो जल बिन,अगन की रात आए तो कितनी भागदौड़ होती रही उम्रभर "उड़ता" अब सोचता हूँ कोई तो अजन1. की रात आए तो 1.जीवन की शानदार

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