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Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 100, जनवरी(प्रथम), 2021

दान

मनप्रीत सिंह संधू

दान का शाब्दिक अर्थ होता है ‘देने की क्रिया’I आधुनिक सन्दर्भों में दान उसको कहते हैं जब किसी जरूरतमंद को सहायता के लिए कुछ दिया जाता हैI सभी धर्मों में सुपात्र को दान देना परम कर्तव्य माना गया हैI जब मानव किसी दूसरे प्राणी को कुछ सहायता में देता है जिसको उसकी आवश्यकता होती है तब मानव को बहुत ख़ुशी मिलती हैI दान किसी वस्तु पर से अपना अधिकार समाप्त करके दूसरे का अधिकार स्थापित करना हैI और दान किसी भी रूप में दिया जा सकता है केवल धन देना दान नहीं है जो भी वस्तु हम किसी जरूरतमंद को देते हैं वह दान हैI किसी को विद्या देना, भूमि देना, खाना देना, गाय देना और किसी गरीब कन्या का विवाह करना आदिI कहा जाता है कि एक हाथ से दिया दान हजारों हाथों लौटकर आता हैI जो हम किसी को देते है वो ही पाते हैं हमारा धर्म हमारे आस्था और विश्वास का फल हमें देता हैI कोई भी अच्छा काम करने से हमें कितनी खुशी महसूस होती हैI लेकिन एक बात है दान उसी को देना चाहिए जिसको उसकी आवश्यकता है वर्तमान में इसका भी गलत प्रयोग हो रहा है हर कोई माँगने बैठा हुआ है जो कि कार्य भी कर सकता हैI

दूसरी ओर कुछ लोग धार्मिक स्थानों पर ऐसा कुछ दान में करते है जिसकी आवश्यकता नहीं होतीI जहाँ सब कुछ पहले बहुत है उसको और दे रहे हैं जिससे दान का गलत प्रयोग हो रहा हैI धार्मिक स्थानों पर हमने देखा है की लोग कितना ढूध मूर्तियों पर बहा रहे है और दूसरी तरह एक आदमी ऐसा है जिसको खाना नहीं मिल रहा है तो क्या यह दान सही है कदापि नहीं या फिर कोई भी धर्म ऐसा कहता है जो भूखा प्यासा है उसको न देकर जहाँ जरूरत नहीं है वहाँ दान दिया जाएI कोई भी धर्म ऐसा नहीं कहता यह हमारे समाज में कुछ लोगों ने धर्म के नाम पर अपनी तरफ से यह ऐसे सिद्धान्त बनाये हुए हैंI यह सब बिलकुल गलत है हर समाज में इसको गलत माना जायेगा और कोई धर्म ऐसा नहीं कहता हैI किसी के पास रहने के लिए मकान नहीं है खाने के लिए खाना नहीं है और कोई ऐसा है जिसका कोई अंग नहीं है वह काम नहीं कर सकता हैI ऐसे लोगों को दिया हुआ दान कभी व्यर्थ नहीं जाताI

दान की महिमा तभी होती है, जब वह नि:स्वार्थ भाव से किया जाता हैI अगर कुछ पाने की लालसा में हम दान करते हैं तो वह व्यापर बन जाता है न कि दानI यहाँ पर हमारे समझने योग्य बात यह है कि दान देना उतना जरूरी नहीं है जितना दान देने का भावI अगर हम कहीं कुछ दान कर रहे हैं या किसी को कोई वस्तु दे रहे हैं लेकिन हमारी देने की इच्छा नहीं है तो वह दान झूठा हुआ, उसका कोई अर्थ नहीं हैI हमारी एक भावना होती है दान देने की जैसे पुण्य मिलेगा या परमात्मा इसके प्रत्युतर में हमें कुछ देगा तो हमारी नजर वह लेने पर है, देने पर नहीं तो क्या यह एक सौदा नहीं हुआI

इस तरह दान का बहुत महत्व है अगर हम एक उदारता का भाव रखते हैं तो हमारा भी अच्छा होता है, कहते हैं कि दान एक हाथ दिया तो हजारों हाथों लोटकर आता हैI जब किसी जरूरतमंद को हम दान देते हैं तो वह कितनी हजारों दुआएँ हमें देता है, इसीलिए तो कहा जाता है कि अच्छा कर्म करने पर हमें अच्छा फल मिलता हैI यह कुछ सोचने जैसा है कि हर आदमी, आदम की तरह सामान्यत बेगुनाह होता है, हर कोई अपने-अपने अच्छे-बुरे कर्मों का फल भोगता हैI आदम के कामों का फल नहींI कर्म करो फल की चिंता मत करो हमारा अधिकार केवल अपने कर्म पर है, उसके फल पर नहींI हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है, यह तो संसार एवं विज्ञान का धारण नियम हैI इसलिए उन्मुक्त हृदय से श्रद्धापूर्वक एवं सामर्थ्य अनुसार दान एक बेहतर समाज के निर्माण के साथ साथ स्वयं हमारे भी व्यक्तित्व निर्माण में सहायक सिद्ध होता है और सृष्टि के नियमानुसार उसका फल तो कालान्तर में निश्चित ही हमें प्राप्त होता हैI

वर्तमान समय में दान देने का महत्व इसलिए बढ़ गया है कि आधुनिकता एवं भौतिकता की अंधी दौड़ में हम लोग दान देना जैसे भूल ही गये हैंI आज हम अपने ही कार्य में इतने व्यस्त हैं कि दान देने का समय जैसे हमारे पास नहीं है ऐसा कुछ सोच रहे है लेकिन यह धारणा हमारी गलत है क्योंकि यह केवल बहाना मात्र है दान न देने काI पहले हर रिश्ते को दिल से समर्पण, त्याग एवं सहनशीलता से दिल से सींचा जाता था, लेकिन आज हमारे पास समय नहीं है, हम सब दौड़ रहे हैं और आज हमारे पास दिल भी नहीं है, क्योंकि सोचने का समय जो हमारे पास आज नहीं हैI लेकिन हमारे पास पैसा और बुद्धि बहुत है, इसलिए हम आज हर वस्तु में निवेश करते हैं, चाहे वह रिश्ते हों, चाहे वह संबंध क्यों न होI आज अगर हम कहें कि हम लोग दान को नि:स्वार्थ भाव से देना भूल गये हैं, देंगे भी तो पहले यह सोच लेंगे के मिलेगा क्या और इसलिए आज समाज टूट रहा है, परिवार टूट रहे हैंI दान देना हमारे विचारों एवं हमारे व्यक्तित्व पर एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालता है, इसलिए हमारी संस्कृति हमें बचपन से ही यह सिखाती है कि हमें देना है, न कि लेनाI हमें अपने बच्चों के हाथ से ऐसे काम करवाने चाहिए ताकि वह अपने बचपन से कुछ अच्छा सीख जाएँ और उनमे संस्कार बचपन से ही आ जाएँI

कुछ लोग केवल धन देना ही दान समझते हैं, लेकिन यह कदापि सही नहीं है कि दान धन का ही होI भूखे को रोटी, बीमार का उपचार, उचित परामर्श, आवश्यकतानुसार वस्त्र, सहयोग और विद्या ये सभी भी बहुत बड़ा दान है यह वस्तुएँ जब हम सामने वाले की आवश्यकता को समझते हुए देते हैं तो बदले में कुछ पाने की अपेक्षा नहीं करते, तो यह सब दान ही हैI जैसे विद्या के दान को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि उसे न तो कोई चुरा सकता है और न ही वह कभी समाप्त होती है बल्कि यह बढ़ती ही है और एक व्यक्ति को शिक्षित करने से भविष्य में हम उस व्यक्ति को दान देने लायक एक ऐसा व्यक्ति बना देते हैं जो समाज को सहारा दे न कि वह खुद समाज पर निर्भर रहेI आज के परिप्रेक्ष्य में रक्त दान एवं अंग दान समाज की जरूरत हैI जो दान किसी की रक्षा करे उससे बड़ा दान और क्या हो सकता हैI हम प्रकृति से बहुत कुछ सीखते हैं सूर्य अपनी रौशनी हमें देता है, फुल अपनी खुशबू, पेड़ अपना फल, नदियाँ अपना जल, धरती अपने सीने पर फसल हमें लुटाती हैI इस तरह सभी बातो का अध्ययन करने पर यह पाया है कि दान देना बहुत बड़ा कदम है लेकिन वह भावना से दिया जाये न कि उससे हमें क्या मिल रहा है ऐसा देखा जायेI नि:स्वार्थ और श्रद्धापूर्वक दिया हुआ दान कभी व्यर्थ नहीं जाताI यह कहावत सच है कि एक हाथ दिया दान हजारों हाथ हमारे पास आता हैI


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