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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 100, जनवरी(प्रथम), 2021

मैं कोहरा हूँ ...

विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र

मैं कोहरा हूँ सर्दी का मोहरा हूँ प्रभावहीन सूरज निरीह जान पड़ता धीरे-धीरे वो भी अपने कदम बढ़ता संभल के चलना मुझमें अगर विवेक है तुझमें मैं कोहरा हूँ सर्दी का मोहरा हूँ पेड़ों से टपकता हूँ बन के ओस पानी यद्यपि सुबह विरानी फिर भी लगे सुहानी वाहन धीरे से चलाना लाइट अवश्य जलाना टकरा के यूँ ही जिंदगी ना गंवाना ये नसीहत है मेरी आगे मर्जी तेरी मैं कोहरा हूँ सर्दी का मोहरा हूँ


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