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Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 100, जनवरी(प्रथम), 2021

ईक्षण

अजय अमिताभ सुमन

जीव तुझमें और जगत में, है फरक किस बात की, ज्यों थोड़ा सा फर्क शामिल,मेघ और बरसात की। वाटिका विस्तार सारा , फूल में बिखरा हुआ, त्यों वीणा का सार सारा, राग में निखरा हुआ। चाँदनी है क्या असल में , चाँद का प्रतिबिंब है, जीव की वैसी प्रतीति , गर्भ धारित डिम्ब है। या रहो तुम धुल बन कर ,कालिमा कढ़ते रहो, या जलो तुम मोम बनकर , धवलिमा गढ़ते रहो। पर परिक्षण में लगो या, स्वयम के उत्थान में, या निरिक्षण निज का हो चित ,रत रहे निज त्राण में। इस जगत में हर्ष भी है , दुःख भी है वैराग भी, पर वरण तेरा हरण भी , क्षीर भी है आग भी। क्या क्षरण हो क्या शरण हो ,शीश की या कि चरण हो, तेरा जग है तेरा ईक्षण , तुष्ट जीवन या कि रण हो। माँग तेरी क्या परम से , या कि दिन की ,रात की, जीव तुझमें और जगत में,बस फरक इस बात की।

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