मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 103, फरवरी(द्वितीय), 2021

चुनाव और आत्म निर्भर भारत

मदन गुप्ता सपाटू

हमारा देश कभी कृषि प्रधान देश कहा जाता था । फिर यह किसान प्रधान हो गया। आज ट्र्ैक्टर प्रधान बन गया है। कभी त्योहारों का देश कहलाता है कभी चुनावों का। हमारे नगर की सड़कों पर, गली कूचों म,ें हर रोज कोई न कोई नेता बैनर से , हाथ जोड़,े खीसें निपोरे झांकता ही रहता है । हारने के बावजूद महीनों , बैनरों पर लटका हुआ आती जाती जनता को ताकता दिखता रहता है मानो कह रहा हो-भईया वोट मने ही देईयो । मुहल्ला कमेटी से लेकर लोकसभा तक के चुनावों की चर्चा, उसके पैम्फलेट, मोबाइल पर मैसेज के रुप में टपकते रहते हैं।

चुनावों के कितने ही फायदे हैं। नेता सरकार बनने पर रोजगार दे न दे परंतु चुनावी दौर में नित्य रोजगार के नए नए अवसर खुद पैदा होते हैं। वोकल फॉर लोकल हो गया है। आपदा को अवसर बनाने का सुअवसर है चुनाव। क्या आपने महसूस किया कि चुनावोत्सव के दौरान, क्राईम रेट घट जाता है। नहीं यकीं तो जनाब आंकड़े देख लीजिए। चोरी, चकारी, लूटपाट, उठाईगिरी यहां तक कि रेप केस भी कम हो जाते है। कारण? अब सब तो इलैक्शन में बिजी हैं। ऐसे छोटे मोटे काम की फुर्सत कहां ? बड़े नेता, छुटभयये नेता, उनके चमचे, चेले चपाटे ,चोर उच्चक्के, उठाईगीर, शातिर बदमाश आदि सब ‘जीतेगा भई जीतेगा’ में मस्त हैं। यहां तक कि अपहरण उद्योग ठंडा है क्योंकि या तो भाई लोग इलैक्शन में खड़े हो गए हैं या कहीं न कहीं सुपोर्ट कर रहे हैं। कौन किसे उठाए? मियां अबी टैम नी है।

चुनावी मौसम में मुर्गियां परेशान! अंडों की पैदावार कैसे बढ़ाई जाए? उपर से बर्डफल्यु । जैसे दीवाली के दिनों में खोए की डिमांड बढ़ जाती है, ऐसे ही इलैक्शन में अंडों की मांग बहुत बढ़ जाती है। खोया तो सिंथैटिक दूध से बन जाता है पर डुप्लीकेट अंडे कहां से लाएं? मुर्गे भी ओवर टाइम लगा कर प्रोडक्शन नहीं बढ़ा सकते। कोरोना में अंडों की डिमांड और प्रोडक्शन दोनों ही कम हो गई थी । अंडों के साथ झंडों , डंडों की मांग तो बढती ही है साथ में गंडों की भी बढ़ जाती है। उन चमत्कारिक बाबाओं, तांत्रिकों आदि के भाग्य के गेट खुल जाते हैं जिन्हें साल भर ढोंगी बता कर कोई पूछता तक नहीं था। हर नेता चोरी छिप्पे गंडा पहन कर ही चुनाव लड़ना चाहता है क्योंकि बाबाओं की 1001 परसेंट गारंटी वाले चमत्कारी यंत्र इन दिनों होलसेल में मैन्युफैक्चर हो रहे होते हैं।

इस बार चुनाव और आन्दोलनों में हर तरह का रोजगार बढ़ा है। टैट वाले जो केवल कनातें लगा कर पैसा वसूल कर लेते थे, आज आधुनिकता की ओर कदम उठा रहे हैं। फोल्डिंग बिस्तरों के साथ साथ फोल्ंिडग टैंटों का भी इंतजाम कर रहे हैं। तलवारें, बरछे, फलेक्सी बेैनर, बड़े होर्डिंग, कारें, जीपें यहां तक कि धोड़े तक अवेलेबल करवाने पड़ रहे हैं। आंदोलनकारियों और चुनावी सभाओं में पंचतारा सुविधाओं यानी गांवों में भी शहर का एहसास दिलाने के लिए, फुट मसाजर, वाशिंग मशीनें, आओमैटिक चपाती मेकर, हीटर एयर कंडीशनर आदि आदि ऑल अंडर वन रुफ उपलब्ध करवाना पड़ रहा है। क्या लोकल हे क्या क्या वोकल ओर कया फोकल है ......सब कुछ आल इन वन। मोबाइल की सेल और उसका डेटा बढ़ रहा है। कोई नेता मोबाइल बांअ रहा है कोई लैप टॉप या टेबलेट। आठवीं फेल ,छोटे मोटे लोग भी साफटवेयर इंजीनियर बन गए हैं। भारत आगे बढ़ रहा है। विरोधी दल का ध्यान इस प्रगति की ओर नहीं जाता। जाए क्यों औेर कैसे ? चुनाव कोई हारे , कोई जीते, रोजगार के अवसर बढ़ रहे हेैं। नए नए आयाम सामने आ रहे हैं।

ढोली ढोल बजाणा बजाणा गीत यूं ही उपकार फिल्म के लिए नहीं बना था। ढोली कभी खाली नहीं रह सकता। एवर ग्रीन प्रोफैशन है। कुछ भी न हो तो भी आपके घर के आगे ढन ढना ढन करके पैसे मांगना शुरु कर देगा। भाजपा जीते या कांग्रेस, उसका ढोल तो बजना ही है। नामीनेशन फाइल करने से लेकर वोट काउंटिंग और बाद में भी उस पर नोट बरसते ही रहते हैं। कइयों ने इस धंधे को हमेशा के लिए अपना लिया है। इस प्रोफैशन में रिसेशन नहीं आता।

ब्रास बैंड वाले भी अपने बड़े बड़े हाथी की सूंड वाले भोपुओं पर ब्रासो की मालिश -पालिश में हर वक्त लगे हैं। इलैक्शन से पहले और इलैक्शन के बाद किसी न किसी का बैंड तो बजना ही है। बैंड मास्टर ,अपनी सिकन्दर और पोरस की फौज सी दिखने वाली टीम को रिहर्सल करवाने में मशगूल हैं। नए नए गीतों की प्रैक्टिस में जुटे हैं जिन पर जोर दार भंगड़ा पाया जा सके। मातमी धुन भी स्टाक में तैैयार रखनी पड़ती है न जाने इलैक्शन रिजल्ट सुनते ही ‘चल उड़ जा रे पंछी अब ये देस हुआ बेगाना ’ बजाना पड़ जाए......।

इधर नया ट्रे्ंड चला है।नई तरह की एम्पलायमेंट जैनरेट हुई है। चुनावी बिगुल बजा।मंच सजा। रैलियों में डेली वेजिज पर लाए गए सुपोर्टरों ने जिन्दाबाद - मुर्दाबाद के नारे लगाए। नेता हार- वार डाल कर , टीका- शीका लगा कर, ओपन गाड़ी पर होठों को 180 डिग्री के एंगल पर लगातार खींचे हुए ,हाथ जोड़े और हिलाते हुए निकले या प्रैस कान्फें्रस का शौक फरमाया तो एक ऐसे नवयुवक की आवश्यकता पड़ती है जिसका जूता फेंकने का निशाना एक दम सधा हुआ हो। ऐसे लोगों की डिमांड भी काफी बढ़ गई है जिनकी जूता मारक क्षमता एक अच्छी मिसाइल की तरह हो।

अब ओपन जीपों के साथ साथ टै्र्क्टरों के भी दिन फिरने लगे हैं। किसान आन्दोलन ने ट्रै्क्टर - ट्र्ालियों को भी वोकल फॉर लोकल बना दिया है। अब जिसकी चुनाव रैली में जितने ज्यादा ट्रै्क्टर दिखेंगे , उसके जीतने की सभावना उतनी ही प्रबल होगी। टै््रक्टर हाईटेक हो गए हैं। टैंकों से टकरा सकते हैं।

नए नए नारों की मन्युफैक्चरिंग वल रही है। यह रिसर्च चल रही है कि किस नारे से कौन खुश होगा ....कौन चिढ़ेगा ? नई नई शब्दावली विकसित की जा रही है। पिछले इलैक्शन में जनता की वोकेबुलरी अर्थात व्याकरण, शब्दकोष और सामान्य ज्ञान में काफी वृद्धि हुई थी। नए शब्द, नए मुहावरे, नई उपमाएं, नवीन अलंकरण जनता को मिले थे। शहजादे, शहंशाह, राज कुमार, पप्पू, भोंदू, फेंकू, छोड़ू़, घघरी वाले बाबा, मैंगो पीपल, सरकारी दामाद, बारात में रुठे फूफा...... आदि नए शब्दों से आने वाली पीढ़ी इन्ट्र्ोडयूस हो गई थी। अब जनता कुछ नए जुमले नए शब्द सुनना चाहती है। बैलेट बुलेट ई वी एम जैसे शब्द सुन सुन कर वोटर बोर हो चुका है। तुम मुझे वोट दो - मैं तुम्हें बोतल दूंगा, लैपटॉप दूंगा, टी वी दूंगा , वाय - फाय दूंगा ....वगैरा वगैरा जुमले पुराने हो गए हैं।

नेताओं पर फूल वर्षा होना 20 वीे शताब्दी का कांसैप्ट था। आज उसकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उस पर कितने जूते फेंके गए, कितने लप्पड़ पड़े, कितने जगह अंडे रिसीव हुए, कितनों ने मुंह पर स्याही फंेकी? यही आंकड़े उसके एक्जिट पोल में काम आएंगे। टी वी चैनल आधे घंटे की न्यूज में 30 बार उस पर उछलता जूता कभी स्लो मोशन में , कभी तीन बार एक साथ, दिखाएगा। यही नेता की पापुलैरिटी का आधार होगा। यानी जीत पक्की।

इसी लिए कई सिक्योरिटी कंपनियों ने जूता ब्रिगेड का गठन किया है जिसमें इस बात का ध्यान रखा जाता है कि निशाना अर्जुन या राठौर की तरह है या नहीं? चलती गाड़ी में फेंका जाए तो नेता के गालों पर फिट आएगा या नहीं। फिर जूता मारक की शारीरिक क्षमता भी अच्छी हो क्योंकि उसके बाद उस पर पुलिस, पब्लिक और सुपोर्टरों ने भी हाथ आजमाने हैं। तो बन्दा चुनावों में अच्छी कमाई कर लेता है। उसी पार्टी का इंश्योरेंस श्योर। सांसद बनने का टिकट बोनस में और जीत की गारंटी पार्टी की। आम के आम और जूतों के दाम ।

अब पैनों में स्याही तो भरी नहीं जाती। बाल पैन, जैल पैनों के युग में टयूब वाले पैन आउट आफ डेट हो चुके हैं। इधर इंक यानी रोशनाई अर्थात स्याही जिससे हम कभी तख्ती पर लिखा करते थे या ‘जी’ या ‘आई’ के निब से ए बी सी डी लिखते थे उसकी डिमांड भी एकदम बढ़ गई। हर नेता की आरजू है कि कोई न कोई उसके चेहरे पर स्याही फेंके और वह काला मुंह पोछते हुए टेलीविजन पर दिखे। सो स्याही बनाने और फेंकने वालों का भी मंदा धंधा भी चंगा हो गया है।

नेताओं का एटीच्यूड इस इलैक्शन ने बदला है।चुनावी रैली में छोटे नेता से लेकर मुख्य मंत्री, केंद्रीय मंत्री तक जूता खाना, थप्पड़ टिकवाना, अंडे टमाटर फिंकवाना, स्याही लगवाना, चप्पल उछलवाना,.......आदि पापुलैरिटी सिंबल मानने लगा है। इनमें से एक आध आयटम उनकी रैली में न हो तो नेता को हार का भूत सताने लगता है। यदि ऐसा न हो तो यह पुण्य कार्य अपनी पार्टी के कार्यकर्ता द्वारा ही संपन्न करवा दिया जाता है और पेड मीडिया के कैमरे दृश्यांकन को पहने ही रेडी रहते हैं । जनता भी ऐसे डेली एपीसोड न्यूज में देखे बगैर सो नहीं पाती। हमारे मित्र बाबू राम लाल हर समय यानी 24 इन टू 7 ,टी वी पर चिपके रहते हैं और विज्ञापन आते ही जूते ,चप्पल, स्याही के आधार पर हमें अपने एक्जिट पोल का रिजल्ट सुना जाते हैं कि अपुन के बटुक लाल को ,कोई मां का लाल हरा नहीं सकता।

खैर हमारा देश विविधता का देश है। आंदोलन , चुनाव , त्योहार हमारे जीवन में रोजाना उत्सुकता बनाए रखते हैं और हम टेलीविजन या मोबाइल पर हमेशा मुंह बाए रहते हैं।


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें