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Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 103, फरवरी(द्वितीय), 2021

ढल गया है दिन

श्वेता साहू

ढल गया है दिन, फिर शाम होने चली थी, फिर ये निगाहें कुछ कहने में नाकाम हो रहीं थीं।। कुछ अरसों बाद कुछ लिखने का दिल किया फिर ख्याल तेरा और ग़ज़लें मेरी आम हो रहीं थीं।। पढ़ न लें कोई आंखें मेरी इसलिए होंठों को खामोश ‌रखा मिल नहीं रही निगाहें फिर भी बातें सरेआम हो रहीं थीं।। या तो चले जाओ मेरी महफ़िल से या आ जाओ मेरी तरफ रहना तुम्हारा मेरी तबाही का इंतेजाम हो रहीं रहीं थीं।। जरा सम्भले रहना मुहब्बत की फिजाओं से तुम मैं तो मैं ही थी लेकिन मुहब्बत तेरे ‌नाम से चल रही थी।।

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