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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 103, फरवरी(द्वितीय), 2021

मेरे दर्द में वो मुस्कराते रहे

डॉ० अनिल चड्डा

मेरे दर्द में वो मुस्कराते रहे, जले पर नमक लगाते रहे । हमने इकट्ठा किये फूलों के बीज, वो चमन में कांटे उगाते रहे । दास्तान-ए-जिंदगी पता न थी, अफवाहें जाने क्यों उड़ाते रहे । असलियत तो छुपी दिल में थी, चेहरे के रंग बनाते रहे । हमारी वफा को जफा कह दिया , खुद वसल-ए-यार बनाते रहे।

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