मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 103, फरवरी(द्वितीय), 2021

मुक्तक

अमर'अरमान'

देश से बढ़कर नहीं है कोई, ये समझो नाक़ारो तुम देश नहीं तो कुछ भी नहीं है, ये समझो मक्कारों तुम। जिस पाक़ धरा से मिला तुम्हें है मान और सम्मान यहाँँ क्यों बेच रहे हो धरा को, अंधभक्त गद्दारों तुम। देश है हमारा तभी अस्तित्व है हमारा रक्षा इसकी करना कर्तव्य है हमारा। जहाँ में सबसे पावन है वतन हमारा कटे भले ही सर पर, झुके न सर हमारा।

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें