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Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 103, फरवरी(द्वितीय), 2021

दाम्पत्य जीवन में सामंजस्य के अवरोध और समाधान

नीरजा द्विवेदी

दाम्पत्य जीवन में सामंजस्य स्थापित करने के लिये क्या करना चाहिये आज यह यक्ष प्रश्न बनता जा रहा है। जिध्रर देखिये विवाह टूट रहे हैं या दम्पतियों में असंतोष बढ़ रहा है। पहले हम इस बिंदु पर विश्लेषण करते हैं कि सामंजस्य बिठाने में अवरोध कौन-कौन से हैं जिससे किशोर-किशोरियों को समझने में आसानी हो कि त्रुटि किससे कहाँ पर हो रही है फिर इसके समाधान निकालें।

1. आज वयस्क होने पर विवाह होते हैं। तब तक दोनों साथी मानसिक रूप से परिपक्व हो चुकते हैं। उन्हें समझना चाहिये कि इसका एक दुष्परिणाम भी होता है कि दोनों साथी अपनी विचार धाराओं पर दृढ़ रहते हैं और दोनों में से कोई भी झुकना नहीं चाहता। अक्सर उनमें किसी न किसी बात को लेकर कहासुनी हो जाती है है। दोनों साथियों में जहाँ अहम की भावना में टकराव हुआ कि इससे वातावरण कटु होने लगता है। दोनों अपनी बात पर अड़े रहते हैं और एक-दूसरे के प्रति असंवेदन शील हो जाते हैं। इस वातावरण में न चाह्ते हुए भी कुछ न कुछ अवांछित मुख से निकल जाता है। इस स्थिति से बचने का तरीका यह है कि वह बात जो दोनों साथियों के मध्य कटुता का बीज बोती हैं उस पर बहस न करें। शांति से उस विषय पर विचार करें। अपने और अपने साथी के विचारों पर चिंतन करें। हो सकता है कि साथी की बात ही सही हो। यदि ऐसा लगता है कि आपकी बात सही है और साथी की बात में आपको जिस बात पर एतराज़ है या जिससे दिक्कत है तो एक कागज़ पर लिख कर अपने साथी को दें। इससे यह लाभ होता है कि किसी बात पर बहस छिड़ने पर विषय भटकता नहीं और बात कहीं की कहीं नहीं पहुँचती। लिख कर देने पर दूसरा साथी ध्यान से असली बात पर विचार करता है और समस्या का कोई न कोई हल शांतिपूर्ण वातावरण में निकल आता है।

2. जब विवाह होता है या युगल आज की नई रीति के अनुसार लिव इन रिलेशनशिप में हैं तो दोनों को यह समझना चाहिये कि ‘दोनों व्यक्तियों के स्वभाव में कितनी भी समानता हो दोनों अलग-अलग वातावरण में पल कर बड़े हुए हैं। दो व्यक्ति समान हो ही नहीं सकते।‘ जब वे एक साथ रहना प्रारम्भ करते हैं तो परस्पर संकोच समाप्त हो जाने पर दोनों का वास्तविक स्वरूप प्रकट होता है। दोनों एक-दूसरे के स्वभाव की विभिन्नताओं से परिचित होते हैं। ऐसी स्थिति में लिव इन रिलेशनशिप वाले साथी एक दूसरे से किनारा करने लगते हैं। यदि लड़का अलग होने का प्रयत्न करता है तो लड़की लोगों से लड़के पर विवाह करने के लिये ज़ोर डलवाती है या रेप के केस लिखवाने लगती है। विवाहित युगल अपने माता-पिता से या संगी साथियों से एक दूसरे की कमियों का बखान करने लगते हैं। मैं समझती हूँ कि अपने सम्बंधों को जहाँ आपने जग ज़ाहिर किया उनमें खटास आना प्रारम्भ हो जाती है। जब तक प्रताड़ित करने की घटनायें न हों बड़ों को बीच में नहीं लाना चाहिये और सम्बंध परस्पर शांतिपूर्ण वातावरण में बात करके या एक-दूसरे को पत्र में लिख कर सुलझाने चाहिये। यह समझ लें कि जहाँ दूसरों के कान में बात पहुँची कि अनचाहे मामला बिगड़ जाता है। आपका मन तो साथी की शिकायत करके हल्का हो गया और आप दोनों में सुलह हो गई। उधर आपने जो गुस्से में साथी के विरुद्ध कहा था वह एक से दूसरे के कान में पहुँच कर बढ़ गया। जब वह बात बढ़ चढ़ कर आपके साथी के कान में पहुँचती है तो उसके अहम को चोट लगती है और सम्बंधों में कटुता आने लगती है। इसको आप इस उदाहरण से समझिये कि दो बच्चों के लड़ने पर थोड़ी देर बाद वे परस्पर खेलते देखे जाते हैं और उनके माता-पिता एक दूसरे से लड़ते रह जाते हैं।

3. जैसे दो व्यक्तित्त्व एक समान नहीं हो सकते उसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति सर्वगुण सम्पन्न नहीं हो सकता। प्रत्येक व्यक्ति में अच्छाई के साथ ही दोष भी होना स्वाभाविक है। साथी को गुण-दोषों के साथ स्वीकार करने पर ही सम्बंधों में सामंजस्य उत्पन्न होता है। इसके लिये रात को सोते समय अपने साथी की अच्छाइयों का स्मरण करें इससे मन शांत रहेगा और सम्बंधों में स्थिरता आयेगी। यदि आप लड़ाई-झगड़े की बातों का स्मरण करेंगे तो अचेतन मन पर इसका दुष्प्रभाव पड़ता है।

4. यदि कभी परस्पर झगड़ा हुआ है और आप बहुत क्रोधित हैं तो एकांत में बैठ कर जो कुछ मन में आये लिख डालें। यदि अपशब्द मन में आयें तो उन्हें भी बिना सोचे-समझे लिख डालें और इसके बाद उस पत्र को जला दें या नष्ट कर दें। इससे आपका मन एकदम हल्का हो जायेगा और फिर शांत मन से अपनी समस्या पर विचार करें। यह ध्यान रक्खें कि जब आपकी अपनी मनःस्थिति ठीक न हो तो दूसरों से बात करना सम्बंधों को खराब करने के लिये आग में घी डालने जैसा साबित होगा।

5. विवाह सम्बंध बिगड़ने पर इसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव बच्चों पर पड़ता है। यह अवश्य ध्यान रखना चाहिये कि जब तक दोनों साथियों में परस्पर सामंजस्य न बैठ जाये संतानोत्पत्ति पर विचार न करें।

6. लड़के-लड़कियों के स्वभाव में तो अंतर होता ही है पालन-पोषण में भी अंतर होता है। सब लड़कियाँ भी मानसिक और शारीरिक रूप से एक समान नहीं होतीं। कोई चंचल और शोख तो कोई शांत या अंतर्मुखी। कोई उछृंखल और बहिर्मुखी विचारों की होती हैं। दिक्कत तब आती है जब एक चंचल और शोख लड़की को ऐसा साथी मिल जाता है जो रिज़र्व नेचर का हो। वह अपनी भावनाओं को प्रकट नहीं करता और इससे उसकी कोमल भावनाओं को चोट लगती है। फिल्म और सीरियल देखकर लड़कियाँ यह समझने लगती हैं कि असली प्यार तभी है जब पति या साथी “आई लव यू’ बोलता रहे और बर्थडे, एनिवर्सरी न भूल जाये। उसको घुमाने ले जाये, उसके लिये गिफ्ट लाता रहे। विवाह के पूर्व या बाद में जो साथी शुरू-शुरू में इन बातों पर ध्यान भी देते हैं वे धीरे-धीरे काम-काज के चक्कर में इन बातों को भूल जाते हैं या नज़र अंदाज़ करते हैं। ऐसी स्थिति में लड़कियाँ यह सोचने लगती हैं कि “साथी उन्हें प्यार नहीं करता। उसे केवल मेरे शरीर से मतलब है।’’ धीरे-धीरे उन्हें निराशा घेरने लगती है और उन्हें साथी से शारीरिक सम्बंध रखने में असहज लगने लगता है। शारीरिक आवश्यकतायें स्त्री-पुरुष की अलग-अलग होती हैं। यदि पुरुष स्त्री की मानसिक स्थिति को समझता है तो स्त्री भी उसकी आवश्यकताओं को समझती है। बल पूर्वक स्थापित सम्बंध स्थाई नहीं होते। दोनों साथियों को यह समझने की आवश्यकता है कि यदि युगल में सामंजस्य स्थापित हो जाता है तो प्रेम की भावना समय के साथ प्रगाढ़तर होती जाती है। यदि किसी लड़की को यह लगता है कि उसके साथी को उसकी भावनाओं की परवाह नहीं है और उसे केवल उसके शरीर से ही सरोकार है तो वह जीवन से निराश होने लगती है। ऐसी स्थिति में उसे यह समझना चाहिये कि पुरुष की शारीरिक आवश्यकता ईश्वर प्रदत्त नैसर्गिक भावना है। सुंदरता और कुरूपता का भी प्यार से कोई लेना-देना नहीं है। प्यार अपने स्वभाव और त्याग से अर्जित करना पड़ता है। इससे उसको जो मानसिक क्लेश होता है वह नहीं होगा। निराशा में लड़कियाँ अपने भोजन पर ध्यान नहीं देतीं। उन्हें अपने शरीर को पर्याप्त पोषण द्वारा ऊर्जावान बनाये रखना चाहिये। यदि शरीर स्वस्थ है तो मन भी स्वस्थ रहेगा। संगीत मन को बहुत शांत करता है। पति के प्रति अपना कर्तव्य पूरा करते हुए अपने को संगीत या किसी न किसी हौबी में व्यस्त रक्खें जो आपको प्रसन्नता दे। पति की बुरी बातों को न याद करके उनकी अच्छी बातों को याद रक्खें और उनसे अपेक्षा रखना बंद कर दें तो दुख नहीं होगा। इस बात का मलाल तो होना ही नहीं चाहिये कि साथी ने लव यू नहीं बोला या गिफ्ट नहीं दिया। मैंने ऐसे भी युगल देखे हैं जिन्होंने कभी एक-दूसरे को लव यू नहीं कहा और गिफ्ट देने का विचार नहीं किया पर लोग उनके परस्पर प्रेम को देखकर ईर्ष्या करते हैं।

7. पति या साथी का प्रेम जीतने का एक अचूक उपाय यह है कि जब कभी पति बाहर से लौटता है तो उसको ऐसा वातावरण मिले कि वह चैन से घर पर बैठ सके। उसे सुकून मिल सके। आपके पास दिन भर की जो शिकायतों की पोटली एकत्रित है उसे पति के आते ही मत खोलने लगिये। जहाँ तक हो जो समस्यायें आप स्वयं सुलझा सकती हैं उनका निराकरण स्वयं कर लें। बच्चों की शिकायत पति से तब तक न करें जब तक आवश्यक न हो। पापा और बच्चों को परस्पर प्रेमपूर्ण वातावरण में मिलने दें। घर के अन्य सदस्यों की बात है या आपकी परेशानियाँ हैं उन्हें उस समय न कह कर जब पति सुस्ता लें और शांत हों तब बता कर समस्या का समाधान निकालें। यदि आपका संयुक्त परिवार है तो पति अपने माता-पिता को भी समय देना चाहता है। इसका बुरा न मानिये। आपकी भाभी के जिस व्यवहार से आपके माता-पिता को कष्ट होता है और आप अपनी भाभी से अपने सम्बंधियों के प्रति जो अपेक्षा रखती हैं वह बातें आप स्वयं भी ध्यान में रक्खें। यदि आप मन में यह विचार रक्खेंगे कि अभी तक एक मम्मी-पापा थे अब दो मम्मी-पापा हैं तो सास बहू का रिश्ता माँ-बेटी के रिश्ते में बदल जायेगा। इसके साथ ही पति-पत्नी के रिश्ते में भी दृढ़ता आयेगी।

यदि इन छोटी-छोटी बातों का ध्यान रक्खा जाये तो परिवारों के टूटने की बड़ी-बड़ी घटनायें नहीं होंगी और परिवार में सुख-शांति का साम्राज्य स्थापित होगा।


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