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Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 103, फरवरी(द्वितीय), 2021

आखिर वह अस्पृश्य क्यूँ हो जाती है?

भारती शर्मा

भारतीय संस्कृति में परम्पराएँ और रिवाज जब बनाये गए थे तो उनके पीछे वैज्ञानिक तर्क व कारण थे। जीवन निर्देशों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित किया जाता रहा है, किंतु बदलाव संसार का नियम है। समय के साथ उन परपराओं की पृष्ठभूमि में जुडा उद्देश्य समाप्त हो चुका है। आज जबकि जीवनशैली में आमूलचूल परिवर्तन आ चुका है तो उनके अस्तित्व पर प्रश्न चिह्न लग जाता है। ऐसी ही कुछ सामाजिक मान्यताओं में से एक है माहवारी और उससे जुड़े नियम कायदे। माहवारी या पीरियड्स सदैव से वर्जनाओं की कैद में रहा विषय है। हमारे समाज में पीरियड्स पर बात करना सभ्यता के दायरे में नहीं आता। इसपर किसी भी तरह की चर्चा की अनुमति नहीं है। इसे विभिन्न सांकेतिक नामों से बताया जाता रहा है। माहवारी के इन दिनों में महिलाओं को अपवित्र व अस्पृश्य माना जाता है। उनका घर की रसोई में, मंदिर में, या किसी भी शुभ कार्य में प्रवेश वर्जित होता है। उन्हें एक अछूत की तरह रखा जाता है। पीरियड्स या माहवारी प्रजनन प्रक्रिया से जुड़ी, महिलाओं में होने वाली एक सामान्य जैविक प्रक्रिया है। जो प्रक्रिया सृष्टि को रचने और मनुष्य के अस्तित्व का कारण हो, वह अपवित्र कैसे हो सकती है? बाकी शारीरिक प्रक्रियाओं की भांति ही यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है तो इसके कारण स्त्री के आत्मसम्मान को कैसे चोट पहुंचायी जा सकती है??

इसके पीछे के कारण समझे बिना हम बस लकीर पीटे जा रहे हैं। यह स्त्री के लिए बहुत मुश्किल दिन होते हैं। इन दिनों में उसकी शारीरिक व मानसिक प्रक्रिया में बदलाव आते हैं। अतः निःसन्देह ही उसको अपेक्षाकृत रूप से आराम की आवश्यकता होती है किंतु जिस दृष्टिकोण से यह होता है वह आपत्ति योग्य है। जिसके शरीर के खून से आपका निर्माण हुआ है, उसके कारण आप नर्क के भागी कैसे बन सकते हैं? किसी रजस्वला के हाथ का खाना खाकर आप पाप के भागी क्यूँ बन जाएंगे? उससे स्पर्श होने से अपवित्र कैसे हो सकते हैं??

इस मुश्किल समय में जहाँ स्त्री को आपके प्रेम स्नेह अपनेपन व देखभाल की आवश्यकता होती है, उसे तिरस्कार या हेयता की दृष्टि से देखना सर्वथानुचित है। उसे आराम भी देना है तो इस प्रकार तो स्वीकार्य नहीं। इसे छुपा कर और सही जानकारी ना देकर उनके स्वास्थ्य से भी तो खिलवाड़ कर रहे हैं। पर्सनल हाइजीन या व्यक्तिगत स्वच्छता से उनको दूर किये हुए हैं।

हम कब अपने घर के मंदिरों, अपने रसोईघरों और अपने दिलों के दरवाज़े पीरियड्स से गुज़र रही महिलाओं के लिए खोलेंगे? हम कब अपने दिमाग़ों पर पड़ी अंधविश्वास की यह अतार्किक धूल हटाएँगे? हम कब बिना हिचक और शर्म के इसपर स्वस्थ्य चर्चा करना आरम्भ करेंगे? अपनी बच्चियों को इसके बारे में सही जानकारी देकर व्यक्तिगत स्वच्छता से परिचित कराएंगे। और उनके शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ करेंगे।

यह कोई शर्मिंदगी का विषय नहीं है.. वर्जनाओं के अंधेरों से निकालने का है। अगर स्त्री महीने के उन कुछ दिनों में अपवित्र है, तो हमें पवित्रता के ऐसे मापदंडों को ही ख़त्म कर देना चाहिए।


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