मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 103, फरवरी(द्वितीय), 2021

नमाज़

राजीव कुमार

’अल्लाह हु अकबर’ अजान के साथ मियाँ बरकतउल्लाह खान मगरीब की नमाज़ पढ़ने बैठ गए। इत्र की खुशबु और उसपे उनके कपड़ों की चमक और उसपर उनका नूरानी चेहरा उनकी खुशमिजाजी को ब्याँ कर रहा था। उनका पुराना नौकर गफुर आते के साथ ही गुलदस्ता गिरा कर, टुकड़े कर दिया। खाँ साहब का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया, उन्होंने आँखें तरेर कर कहा ’’ तुम अपनी जाहिलीयत से बाज नहीं आओगे। ’’ उनको यह भी याद हो आया कि पीछले सप्ताह इसने हलुआ पर हाथ साफ कर लिया था, उनको याद आया कि अम्मी की बीमारी के नाम पर लिया रूपया अभी तक नहीं लौटाया है, उनको यह भी याद आया कि इसने मेरी लखनवी शेरवानी जला दी थी और न जाने क्या-क्या आद आया, खाँ साहब उठे और गफुर पर एक दर्जन बेंत जमा दिए, मजाल है कि गीनती में गलती हो जाए। गफुर तो उनके इस दरियादिली को, दिलोदिमाग पर तरोताजा कर वहाँ से चला गया। अब खाँ साहब नमाज़ में अपना दिल लगाने की कोशिश करने लगे। अल्लाह की रहमत जो भी हो, उनको खुद-ब-खुद इल्म हो गया कि आज की दुआ कबुल नहीं होगी। पछतावा तो उनके खून में ही नहीं था।


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें