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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 103, फरवरी(द्वितीय), 2021

सुना है आबाद रहे...

सुरेंद्र सैनी बवानीवाल "उड़ता"

सुना है पुराने ख़्वाब आबाद रहे ख़त में लिपटे गुलाब आबाद रहे नहीं गुजरी ख़ुशबू तेरे स्पर्श की सभी सवाली जवाब आबाद रहे कैसे भूला पाते पुराने वक़्त को ज़हन में उनके शबाब आबाद रहे कुछ दिल में कुछ दिमाग़ में था बाकी कहीं हिज़ाब आबाद रहे काफ़ी कहना सुनना ना हो सका क्यों मिज़ाज़ में इताब आबाद रहे "उड़ता" तमाम उम्र वो याद रहे और तेरे कुछ ख़्वाब आबाद रहे

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