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Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 103, फरवरी(द्वितीय), 2021

नशा मुक्ति

सन्तोषी किमोठी वशिष्ठ

जिन्दगी की पटरी पे बहुत से नशे हैं, क्यों पीने का शौक रखते हो गम तो बहुत हैं लेकिन शरीर तो तुम्हारा है,। अश्कों से पीना सीख लो बाकी जहर तो बहुत पियें होंगे खुद का गम पी कर देखो इसके सामने सब नशे फीके हैं,,।। जीने का शौक रखते हो मगर जहर किसी और के साथ पीते हो,। ये शरीर उसका भी अपना नहीं है फिर क्यों गम का सहारा लेते हो,,।। प्रकृति में बहुत नशे हैं उनके साथ कुछ पल जी कर देखो, दो घूँट पीने से जख्म नहीं भरते पल भर में उतर जायेगा और फिर दद॔ बहुत होगा,, जो जहर पीते हो कुछ पल में ही शक्तियों को छीण कर देगा दो घड़ी नशे में जी लेंगे फिर उतर जायेगा, पीना ही है तो प्रकृति का अद्भुत सौन्दर्य पी लो जिसमें रिश्ते रूपी फूल खिले हैं,। हर रिश्ते में हर वो नशा है जिनके लिए लोग हर पल तरसते हैं,।। साँसों की ये पतंग एक दिन उड़ जानी है, क्यों गम का बहाना लेकर पीते हो,। ये शरीर तो प्रकृति की मिट्टी है, इसमें क्यों जहर घोल जाते हो,,।। संमा कुछ भी हो खुद को सम्भाल ले ऐ प्राणी, अश्कों से पी ले अपने गम को काँच की ये बोतलें टूट जानी हैं,। न तुम रहोगे न हम रहेंगे,फिर क्यों किसी के गम का सहारा लेते हो पीने का शौक रखते हो तो, अपनों की खुशी पी कर देखो ये नशा कुछ और ही है, जो न जहर है न कोई गम का बहाना इक अलग ही आनंद है जिसमें सब रसों का भरपूर मिश्रण है, क्यों जहर पीने का शौक रखते हो, ये शरीर तो प्रकृति की मिट्टी से बना एक फ़ुवारा है,, पीना ही है तो प्रकृति से भरे रस को पी लो जिसमें सब रसों का आनंद और पूण॔ श्रृंगार भरा है, जो न तुम्हारा है न हमारा है सिर्फ सबके भावों का किनारा है,,।। डूब जाओ इस भव सागर में सब रसों का नशा भरपूर भरा है, क्यों पीने का शौक रखते हो वो बोतल में भरा जहर जिसके टूट जाने पर भी शरीर को चुभता ही है, गम तो कम न होगा इक और दद॔ मिल जायेगा क्यों पीने का शौक रखते हो शरीर तो तुम्हारा है, अश्कों से पी कर तो देखो हर रिश्ते को जी कर तो देखो इक अलग ही आनंद और प्रकृति के संग झूमने का अहसास और जीने का सहारा ये भव सागर भावों से भरा नशे का प्याला ही तो है,।।


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