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Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 103, फरवरी(द्वितीय), 2021

तुम मिले

संघमित्रा चंचल

तुम मिले अवसाद के क्षण प्रिये ! कि जैसे बंजर-सी भूमि पर किसी मूसलाधार बारिश का आना जैसे किसी अनाथ-से बच्चे को एक बेहद ममतामयी मां का मिल जाना, हां कुछ ऐसे ही. . . तुम मिले अवसाद के क्षण प्रिये ! तुम्हारे आ जाने पर हां मेरा संवर जाना जैसे घट रही जीने की चाहत का बढ़ जाना जैसे लंबे समय से, किसी एक ही कमरे में बन्द रहने के बाद खुले आकाश और हरे भरे खेतों के बीच जाना क्यों न अब इस नये जीवन का स्वागत करूं क्योंकि, तुम ही दिए ये नया-सा जीवन प्रिये ! तुम मिले अवसाद के क्षण प्रिये ! मायूसी छाए चेहरे पर किसी चंचल भरे मुस्कान का आ आना जैसे डूबते हुए सूरज का भी, एक नया सवेरा ले आना हां कुछ ऐसे ही. . . तुम मिले अवसाद के क्षण प्रिये !


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