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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 103, फरवरी(द्वितीय), 2021

शुरू करते हैं फिर से मोहब्बत, तुम चले आओ !

संघमित्रा चंचल

शुरू करते हैं फिर से मोहब्बत, तुम चले आओ थोड़ा हम बदल जाते हैं थोड़ा तुम बदल जाओ हमारे वक्त एक दूसरे के लिए होंगे ऐसा कह तुम वापस आ जाओ शुरू करते हैं फिर से मोहब्बत तुम चले आओ ! सुनो! कोई नियम और बंदिश नहीं होगी इस बार और जो पहले के हैं उन्हें तोड़कर चले आओ, तुम्हारे जाने से ये वक्त, ये जगहे भी रूठी हैं मुझसे ना गले लगाते हो तुम, ना ये अपनाती हैं ठीक है छोड़ो मेरी बाते मनाने नहीं आता तुम्हे, मुझे पर वक्त को मनाने आ जाओ जो वीरान हो आई हैं तुम बिन जगहें, उन्हे खूबसूरत बनाने आए जाओ शुरू करते हैं फिर से मोहब्बत, तुम चले आओ. .


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