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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 103, फरवरी(द्वितीय), 2021

गढ़ दो मुझको

ऋचा सिन्हा

मैं एक उदासी भटक रही हूँ अपनी वेदनाओं में गा रही हूँ कुछ भूले बिसरे गीत सुर जो ठीक नहीं लग रहे सुबह की धूप हो या रात की कालिमा सब एक समान समझ नहीं कि कब सूरज डूबा कब चाँद निकला तुम जब थे तुम्हारी गर्म साँसों में सेकती थी खुदको तुम्हारी हर छूअन याद है मुझे तुम्हारे साथ गर्वान्वित महसूस करती थी अब बिखर गई हूँ इकट्ठा कर गढ़ दो मुझे सुरों को लगा दो सही स्थानों पर मेरे असमंजस भरे जीवन को राह दो सूरज चाँद के भेद को मिटा दो मेरी शिथिल काया में जान फूँक दो फिर महका दो मेरी साँसों को अपनी साँसों के साथ मेरे सूखे रेगिस्तान में कुछ बारिश करा दो लौटा दो मुझे हम दोनों का साथ कुछ नए गीतों के साथ एक बार फिर गढ़ दो मुझको।


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