मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 103, फरवरी(द्वितीय), 2021

सदियों से खड़े हैं वृक्ष

ऋचा सिन्हा

सदियों से ये विशालकाय वृक्ष अपना परिचय दे रहे हैं हमारी धरोहर हमारे संस्कारों के साक्ष्य प्रस्तुत कर रहे हैं ना जाने कितने वर्षों से यहाँ वहाँ इसी अवस्था में खड़े हैं कितने युद्ध के साक्षी बने हैं कितने अपमान सहे हैं घायल हुए हैं दुरुस्त हुए हैं आँधी तूफ़ानों का सामना कर कितनी ही बार गुजरे हैं ये वृक्ष कितनी ही चीत्कार सुनी है कितनी निर्दयता देखी है स्वतंत्रता सेनानियों को सहारा दिया कितने ही क़ातिलों को छुपाया है अपनी आड़ में कितने योद्धाओं को छाया प्रदान की है कभी कोई शिकन नहीं शिकवा नहीं मूक दर्शक बन देख रहे हैं सब काया कलाप बेज़ुबान ये वृक्ष कितनी ही बार रोए हैं देश को बदलते देखा है कोई बेरहमी से नोच दे तो कोई धागा बांध दे तो कोई दीपक जला दे किसी के लिए मंदिर हैं कितने ही पक्षियों के नीड़ हैं सहज सरल विश्वसनीय हैं कितने ही प्रेमियों के विश्राम स्थल हैं ये वृक्ष जलती तपती धूप में वर्षा में आँधियों में सहजता से खड़े वृक्ष छाल कुछ सख़्त हो गई है देखने में भद्दे हो गए है अब बूढ़े हो गए है ये वृक्ष...... खड़े तनहा अपने हिस्से की सेवा लगातार करते हुए....


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें