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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 103, फरवरी(द्वितीय), 2021

आस्था के स्वर

रीता तिवारी "रीत"

धरा के हर सृजन में गूंजते हैं आस्था के स्वर| जगत का परम पालक वह समाया है जहां ईश्वर| मनुज़ के वेश में आते हैं धरती पर जहां भगवन, वह फूलों में बने खुशबू और नदियों में बहे प्रतिपल|1|| चराचर में जो छाए हैं उन्हीं में जग समाया है| इस सृष्टि में है जो कुछ भी उन्हीं की बस तो माया है| तिमिर का नाश करके वह प्रकाशित जग को करते हैं, उनके दम से यह दुनिया उन्हीं की सब पर छाया है ||2|| दिल में आस्था सच्ची तो ईश्वर मिल ही जाते हैं| है कर्मों पर टिका जग यह कर्म फल सब ही पाते हैं| इस नश्वर देह की खातिर जो करते पाप है जग में, यह कहती "रीत"उनको कर्म के फल मिल ही जाते हैं||3||

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