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Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 103, फरवरी(द्वितीय), 2021

बिटिया और बछिया

बृज राज किशोर

कहाँ रानीखेत की सुरम्य वादियाँ और कहाँ देश की राजधानी दिल्ली से सटा हुआ नोएडा। गर्मी यहाँ इतनी भयंकर पड़ती है कि तन और मन दोनों जल-भुनकर रह जाएँ। लेकिन क्या करें, अगर जॉब करना है तो बहुत कुछ सहन करना पड़ता है। आख़िर एम. ए. तक की पढ़ाई और फिर शोध करके पी.एचडी. की उपाधि इसलिए तो नहीं ली थी कि घर की चारदीवारी में बन्द रहना है या पुराने ज़माने की लड़कियों की तरह थोड़ी बहुत पढ़ाई करके शादी कर लो और बक़ौल माँ-बाप अपनी घर गृहस्थी सम्हालो।

रानीखेत के एक सरकारी स्कूल से बारहवीं कक्षा पास करके जब पहली बार स्नातक की पढ़ाई के लिए अल्मोड़ा यूनिवर्सिटी जाने की बात उठाई तो कुछ कम हंगामा नहीं मचा था। बाबा ने तो छूटते ही ना बोल दी। वह तो माँ मेरे पक्ष में थी, सो जैसे-तैसे करके उन्होंने ही बाबा को मनाया," अल्मोड़ा कौन सा कोई परदेस में है? दो ही घंटे का तो रास्ता है। अरे अपना इलाक़ा, अपने लोग। आख़िर अपने कुमाऊँ में ही है न? और वहाँ कितने तो रिश्तेदार हैं अपने? ऐसा बिल्कुल नहीं लगेगा कि लड़की कहीं बाहर गई है।"

अल्मोड़ा में बी.ए., फिर अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. करते कब पाँच साल बीत गए, पता ही न चला। हर हफ़्ते तो घर जाना हो जाता था। उम्र बाइस की हो चली तो रिश्तेदारों ने बाबा के कान भरने शुरू कर दिए। अरे लड़की को घर में बिठाए रखोगे क्या? शादी-वादी करो इसकी। देखो जनार्दन, लड़की को इतनी छूट देना ठीक नहीं। बाहर परदेस में कुछ ऊँच-नीच हो गई तो पछताओगे। कुछ रिश्तेदारों ने तो रिश्ते भेजने भी शुरू कर दिए। लेकिन अपने राम ठहरे धुन के पक्के। साफ़ कह दिया कि पहले पी.एचडी. करेंगे और वह भी लखनऊ यूनिवर्सिटी से और उसके बाद नौकरी करेंगे। घर में क्लेश तो होना ही था। हमें भी अनशन का सहारा लेना पड़ा। बेटी के उपवास के आगे बाबा कितने दिन टिकते? आख़िर इकलौती संतान, तीसरे दिन हथियार डाल दिए, जो करना है करो।

लखनऊ यूनिवर्सिटी से पी.एचडी. करने में तीन बरस गुज़र गए। तब पहली बार पता चला कि पहाड़ों के बाहर भी एक दुनिया है, जहाँ बेहद गर्मी पड़ती है। पहाड़ वालों के लिए तो सहना और भी मुश्किल। आदत पड़ते-पड़ते एक साल लग गया। किन्तु लक्ष्य के आगे सब बौना लगता रहा। पी.एचडी. के बाद प्रवक्ता पद के लिए इन्टरव्यू देने शुरू किए तो तक़दीर ने यहाँ नोएडा लाकर पटक दिया। अब तो तीन साल हो गए हैं काम करते। साल में बस दो ही चक्कर लग पाते हैं घर के। एक तो दीवाली पर, दूसरे गर्मी की छुट्टियों में। दीवाली पर तो दो-तीन दिन ही घर पर रहना हो पाता है, पर गर्मियों की छुट्टियाँ पूरे डेढ़ महीने की होती हैं। नोएडा की भीषण गर्मी से दूर पहाड़ों की गोद में अपने घर माँ-बाबा के साथ रहना कितना सुकून भरा होता है, बता नहीं सकती।

नोएडा और रानीखेत के बीच का सफ़र भी मज़ाक़ है क्या? पहले बस से हलद्वानी जाओ और वहाँ से रानीखेत। पूरा दिन ही चाहिए, सुबह- सवेरे एक तरफ़ से चलो तो रात गए तक पहुँचो। या फिर हलद्वानी और दिल्ली के बीच की दूरी रात की ट्रेन से तय करो। कुछ भी करो यात्रा बेहद लम्बी और थका देने वाली होती है। घर जाते समय तो एक सुकून होता है कि घर जा रहे हैं, जहाँ आराम ही आराम। माँ-बाबा का लाड़-दुलार, मनपसन्द खाना, पुराने परिचितों से मिलना-जुलना, मौज-मस्ती और ठण्डा-ठण्डा मौसम। लेकिन गर्मी की छुट्टियों के बाद काम पर लौटना......बाप रे। लम्बी थकान भरी यात्रा और अगले दिन से कॉलेज का व्यस्त शेड्यूल।

इस बार भी यही हुआ। रात की ट्रेन में रिज़र्वेशन उपलब्ध नहीं हुआ, सो सवेरे ही रानीखेत से निकलना पड़ा। हलद्वानी पहुँचते-पहुँचते ही ग्यारह बज गए, यहाँ नोएडा तक आते-आते रात के आठ बज गए और कमरे तक आते-आते साढ़े नौ। शरीर थक कर चूर। वह तो माँ ने हमेशा की तरह रास्ते का और रात का खाना बनाकर दे दिया था, वरना तो भूखे ही सोना पड़ता। सफ़र के बाद कमरा खोलकर कुछ बनाने का तो सवाल ही नहीं उठता। जैसे-तैसे पेट में कुछ ठूँसा और बिस्तर पर चित।

यहाँ नोएडा में बाहर खाने या टिफ़िन वग़ैरा मंगाने की बजाय मैं दोनों समय खुद ही खाना बनाती हूँ। किचन ढंग से सैट की हुई है। यहाँ कुछ ही दूर पर एक आंटी हैं, जिन्हें मौसी कहने लगी हूँ, उन्होंने दो गाय पाल रखी हैं। सुबह-सुबह आधा लीटर दूध ले आती हूँ, चाय बनाने और रात में पीने के लिए। बड़ी ख़ुशमिज़ाज महिला हैं, ख़ूब बातूनी। छुट्टी से आती हूँ तो ढेरों बातें पूछती हैं घर-परिवार की। आज गई तो कुछ चुप-चुप सी थी, बस इतना ही कहा, "आ गई बिटिया?" न घर की बात पूछी, न माँ-बाबा की कुशलक्षेम। मैंने ही कहा, " मौसी, बड़ी चुप सी हो, घर में सब ठीक-ठाक हैं न?" मौसी ने कुछ जवाब नहीं दिया, अलबत्ता उनका व्यवहार अप्रत्याशित था। मुझे भी इतना समय नहीं था कि उन्हें कुरेदती। सोचा शाम को कॉलेज से लौटकर कुछ देर के लिए मिलने आ जाऊँगी और तभी थोड़ा विस्तार से बात करूँगी।

कॉलेज में व्यस्तता के बावजूद मौसी का अनमना सा चेहरा मुझे परेशान करता रहा। फिर याद आया कि मौसी की बहू को बच्चा होने वाला था, कहीं कुछ ऊँच-नीच तो नहीं हो गई। मैंने तय कर लिया कि शाम को मौसी के यहाँ जाना ही है। जब मैं उनके घर पहुँची तो मौसी शाम का दूध निकाल चुकी थी और जो एक-दो ग्राहक थे, दूध ले जा चुके थे। मुझे असमय आया देखकर मौसी हैरान तो हुई पर उन्हें कहना ही पड़ा, "आओ बिटिया।" मैं जाकर बाहर के कमरे में बैठी और उनकी बहू के होने वाले बच्चे के सम्बन्ध में जिज्ञासा प्रकट की। बस, जैसे मैंने उनकी दुखती रग पर उँगली रख दी। वे फट पड़ी। सामने आया कि बहू ने तीसरी बिटिया को जन्म दिया है और इस बार भी बेटे की आस लगाए बैठी मौसी को बड़ा झटका लगा है। उन्होंने बेटी होने की सारी ज़िम्मेदारी बहू पर डाल दी थी। मैंने घर के तनावपूर्ण माहौल को भाँपते हुए भी बहू और नवजात बच्ची को देखने की इच्छा प्रकट की। दुखी मौसी को यह अनुमति देनी ही पड़ी। मैंने पाया कि बच्ची बेहद सुन्दर और गोल-मटोल है, लेकिन उसकी माँ घर के तनाव को लेकर मायूस। दो बड़ी बच्चियाँ अपनी माँ के निकट दादी के डर से सहमी-सहमी खड़ी थी।मैंने उन्हें प्यार से पुचकारा और उनकी माँ को दिलासा दिया कि आजकल बेटा और बेटी में कोई भेद नहीं है। बेटियाँ वे सारे काम कर रही हैं जो पहले केवल बेटे करते थे।

अब समझाने की बारी मौसी को थी। मैंने उनसे पूछा कि वे लड़की के जन्म पर इतनी दुखी क्यों हैं? मौसी के पास कुछ रटे-रटाए कारण थे, जो वे पुराने ज़माने से सुनती चली आ रही थी। पहला तर्क, "बेटे से ही तो वंश चलता है, बेटियाँ तो पराया धन हैं, ब्याह कर 'अपने' घर चली जाती हैं।" मैंने कहा, "कहाँ मौसी, आपके बेटे को भी तो वंश चलाने के लिए आख़िर 'पराए' घर की एक लड़की को ही ब्याह कर लाना पड़ा। वह अकेला कैसे आपका वंश चला सकता था?" मौसी तर्क से निरुत्तर दिखी तो दूसरा पत्ता फेंका, "बहू में ही कुछ कमी है, वरना तीनों बार लड़की ही क्यों पैदा हुई?" मैंने कहा, "किस दुनिया में रहती हो मौसी? भगवान ने किसी महिला को यह शक्ति नहीं दी कि वह गर्भ में अपनी संतान का लिंग निर्धारण कर सके। जिन गुणसूत्रों से लिंग निर्धारण होता है, वह केवल पुरुष के पास होते हैं। अगर लड़कियाँ पैदा होने को आप कमी मानती हैं तो वह कमी अपने बेटे में ढूँढिए, बहू में नहीं," मेरी आवाज़ कुछ तल्ख़ हो चली थी। "ज़माना बहुत आगे बढ़ चुका है मौसी। मैं भी एक लड़की हूँ। अच्छी पढ़ाई करके घर से चार सौ किमी. दूर अकेले रह रही हूं और अपने दम पर एक लाख रुपए महीना कमा रही हूँ। आपका बेटा कितना कमा रहा है?" मुझे पता था कि मौसी का बेटा ज़्यादा पढ़ा-लिखा नहीं था और दस हज़ार रुपए महीने में एक डिपार्टमेन्टल स्टोर में सेल्समैन था।

मैंने मौसी को ख़ूब समझाया कि अपनी पोतियों को जी भरकर प्यार दें, उन्हें पढ़ा-लिखाकर क़ाबिल बनाएँ, ये बेटियाँ ही आगे चलकर उनके लिए गर्व का कारण बनेंगी। मुझे नहीं पता कि मौसी पर मेरी बातों का कितना असर हुआ, पर चलते समय मैंने महसूस किया कि बहू के प्रति उनकी तल्ख़ियां कुछ कम हुई हैं।

यह बात यहीं आई-गई हो गई होती और यह कहानी लिखने की कदापि ज़रूरत न पड़ती, अगर कुछ माह बाद एक और घटना न हो गई होती। क़रीब पाँच माह बाद की बात है। एक दिन सुबह दूध लेने गई तो पता चला कि रात में मौसी की एक गाय ने बच्चा दिया है। पूछने पर पता चला कि बछड़ा है। मैंने मौसी को बधाई दी तो वे तुनक पड़ी, " अरे बिटिया, बछड़े की काहे की बधाई? बछिया होती तो बड़ी होकर गाय बनती, दूध देती, घर में कुछ कमाई होती। बछड़े का कोई क्या करेगा?" मेरे दिमाग़ में खेती-बाड़ी को लेकर बैल की आवश्यकता के सम्बन्ध में बचपन में पढ़ी गई तमाम कहानियाँ घूम गई, ख़ासकर मुन्शी प्रेमचन्द की "दो बैलों की कथा"। मैंने मौसी से प्रतिवाद किया, "क्यों मौसी, बछड़ा भी तो बड़ा होकर बैल बनेगा और खेती में काम आएगा।"

"अब कहाँ बैलों से खेती हुई रही है बिटिया? तमाम काम ट्रेक्टर से हुई। ई बछड़े को तो कुछ दिन पालना पड़ेगा और फिर छोड़ देंगे ऐसे ही," मौसी बोली।अब मुझे यहाँ शहर की सड़कों पर छुट्टा घूमते साँड़ों की कहानी समझ में आई। साथ ही यह भी कि दुनिया में बेटा-बेटी का सारा खेल अर्थतन्त्र से जुड़ा है। समाज को गाय-भैंस का मादा बच्चा चाहिए ताकि वह बड़ा होकर दुधारू पशु बन सके, लेकिन अपने घर में बेटी नहीं चाहिए। बेटी यानि पढ़ाई लिखाई के बाद भी शादी में दहेज के नाम पर भारी-भरकम एकमुश्त ख़र्च। बेटा होने पर यही दहेज आने की उम्मीद। साथ ही बुढ़ापे में बेटे द्वारा देखभाल की आस। यह अलग बात है कि यह उम्मीद किसकी और कितनी पूरी होती है?


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